एक उत्कृष्ट लेखिका, एक निडर क्रांतिकारी और भारत की पहली सत्याग्रही के रूप में जानी जाने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम भारत के गौरवशाली इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। इस महान महिला ने अपने प्रभावशाली लेखन और व्यक्तित्व से अतीत में जो छाप छोड़ी है, उसे कभी भी मिटा पाना असंभव है। उनका जीवन कई लोगों के लिए प्रेरणादायक है और आज भी बहुत सी महिलाएं इन्हें अपने आदर्श मानती हैं। आइए, आज इस विख्यात लेखिका की 117वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए, उनके जीवन और कार्यों को याद करते हैं।

"खूब लड़ी मरदानी वो तो झांसी वाली रानी थी"


सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 में यूपी में इलाहाबाद (प्रयागराज) के पास निहालपुर गांव में एक राजपूत परिवार में हुआ था। एक पुरुष प्रधान समाज में रहकर, एक छोटे से गांव से लेकर पूरे देश में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने का उनका सफर निश्चित रूप से काफी चुनौतिपूर्ण था। उन्हें बचपन से लेखन में रुचि थी, जिसके चलते उन्होंने काफी छोटी उम्र से लिखना शुरू कर दिया था और 9 साल की उम्र में उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई थी। 1919 में प्रयागराज के क्रॉस्थवेट गर्ल्स स्कूल से उन्होंने मिडिल-स्कूल की परीक्षा पास की थी। उन्होंने अपनी जीवनकाल में कुल 88 कविताओं और 46 लघु कथाओं की रचना की। इन रचनाओं में उन महिलाओं की पीड़ा को भी बड़े मार्मिक ढ़ग से दर्शाया गया है, जिन्होंने अपना सब कुछ देश पर न्योछावर कर दिया।


'झांसी की रानी' कविता ने उन्हें प्रसिद्धि के नए शिखर पर पहुंचा दिया और हिंदी साहित्य में उनकी इस रचना ने विशेष स्थान प्राप्त किया। इस कविता के ज़रिए उन्होंने झांसी की रानी समेत कई स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और त्याग को पन्नों पर फिर से जीवित कर दिया था। इन पंक्तियों में उनकी भावनाएं व्याप्त हैं, जिन्हें उन्होंने लिखने के साथ वास्तविक जीवन में जिया भी था।

क्रांतिकारी के रूप में उनका जीवन


साहित्य के अलावा, आज़ादी की लड़ाई में भी उनका योगदान अतुल्यनीय व अविस्मरणीय है। वह महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली पहली महिला थीं, और स्वतंत्रता संग्राम उन्होंने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। झांसी की रानी की तरह वह भी अपने जीवन में अंग्रेज़ों के खिलाफ खूब लड़ीं और इस देशभक्ति के चलते उन्होंने जेल में यातनाओं का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी। 1923 और 1942 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण, उन्हें दो बार जेल जाना पड़ा। देश के प्रति उनके इसी समर्पण और प्रभावशाली लेखन ने अन्य देशभक्तों में क्रांति और आशा की लौ को बुझने नहीं दिया।

44 साल की उम्र में हुआ उनका निधन


इस सम्माननीय हस्ती ने 15 फरवरी 1948 में 44 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन आज भी उनका जीवन और उल्लेखनीय कार्य लाखों लोगों का मार्गदर्शन करते हैं। वह भारत की उन सशक्त महिलाओं में से एक हैं, जिनकी रचनाओं को हमारे देश में बहुमूल्य धरोहर के रूप में देखा जाता है। उनके सम्मान में, उनके नाम पर एक भारतीय तटरक्षक जहाज का नाम रखा गया है। आज गुगल ने उनकी 117वीं जयंती पर एक डुडल के माध्यम से श्रंद्धांलि अर्पित की।

अपनी मृत्यु के बारे में सुभद्रा कुमारी चौहान ने एक बार कहा था-

"मेरे मन में तो मरने के बाद भी धरती छोड़ने की कल्पना नहीं है। मैं चाहती हूं, मेरी एक समाधि हो, जिसके चारों तरफ मेला लगा हो, बच्चे खेल रहें हो, स्त्रियां गा रही हो और खूब शोर हो रहा हो।"