जबकि अपनी योग्यता को पहचानकर अपने लिए एक मार्ग प्रशस्त करना एक कठिन यात्रा है, लेकिन कुछ असाधारण मनुष्य इतनी सर्वोपरि ऊंचाइयों तक पहुँच जाते हैं कि उनके नाम से उनका स्थान परिभाषित होता है। उत्तर प्रदेश को गौरवान्वित करने वाले कुछ ऐसे ही महान व्यक्तियों के अतुलनीय कार्यों को अमर करते हुए उन्हें 9 नवम्बर को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। आईये जानते हैं उत्तर प्रदेश के वर्ष 2021 के पद्मश्री विजेताओं के असामान्य जीवन,महान कार्यकाल और अनेक ज़िन्दगियों को उजागर करने वाले अद्भुत जज़्बे के बारे में।

उषा यादव

कानपुर शहर में जन्मी और पली-बढ़ी डॉ. उषा यादव इस साल पद्मश्री पाने वाले देश भर के 102 प्रतिष्ठित नागरिकों में से एक हैं। कानपुर विश्वविद्यालय की पीएचडी डिग्री की पूर्व छात्रा डॉ. उषा की कहानियां अक्सर बच्चों, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों पर आधारित होती हैं। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय उनके जीवन को घेरने वाले मुद्दों पर 100 से अधिक पुस्तकों को दिया है। ऊषा जी ने नवीनतम पुरस्कार के साथ एक उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है, लेकिन यह उनका पहला सम्मान नहीं है। इससे पहले, उन्हें बाल साहित्य भारती पुरस्कार, बच्चों के साहित्य के लिए सर्वोच्च सम्मान, महात्मा गांधी द्विवार्षिक हिंदी साहित्य पुरस्कार, मीरा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

चंद्र शेखर सिंह

विकासशील किसान चंद्रशेखर सिंह जी को कृषि क्षेत्र में अपने बहुमूल्य योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा गया। उन्होंने  धान, गेहूं, अरहर और चना के बीज पर लगातार प्रयोग करके अच्छी नस्ल को किसानों तक पहुंचाया है जिससे किसानों को काफी लाभ मिला है। बाबा विश्वनाथ, नीलकंठ, मयूरी, दामिनी जैसे बीज काफी सफल रहे हैं। उनके पिता भी अच्छे बीज पर काम करते रहे।

रामयत्न शुक्ल

गंगा के पावन तट पर बसे कोनिया क्षेत्र के कलातुलसी निवासी संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के व्याकरण विशेषज्ञ, संकाय के पूर्व प्रमुख एवं काशी विद्वत परिषद के अध्यक्ष महामहोपाध्याय सेवानिवृत्त प्रो.रामयत्न शुक्ल को संस्कृत शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत के सर्वोच्च सम्मान पद्म श्री के लिए चुना गया है। मुख्य रूप से भदोही जनपद के कोनिया क्षेत्र के कलातुलसी गांव निवासी प्रो शुक्ल तमाम छात्रों को आजीवन संस्कृत की नि:शुल्क शिक्षा दे रहे हैं।

अशोक कुमार साहू

युवाओं से लेेकर बुजुर्गों का अवसाद दूर करके उन्हें जीना सिखाना ही अशोक कुमार साहू जी के जीवन का मकसद रहा है। इसी भावना के साथ उन्होंने ‘धम्म कल्याण कानपुर अंतरराष्ट्रीय विपश्यना साधना केंद्र’ की स्थापना की। आज इन महान और परोपकारी समाजसेवी 68 वर्षीय अशोक कुमार साहू को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है।

10 वर्ष पहले उन्होंने इस विपश्यना साधना केंद्र की स्थापना की थी। ड्योढ़ी घाट स्थित केंद्र की खासियत यह है कि यहां पर 47 भाषाओं में साधना कराई जाती है। इसके लिए कई सॉफ्टवेयर हैं। यहां विदेशियों का भी तांता लगा रहता है। महीने में दो कोर्स कराए जाते हैं, जो 10-10 दिन के समय अंतराल के होते हैं।

जगदीश चौधरी (मरणोपरांत)

वाराणसी के डोमराजा के रूप में काम करने वाले जगदीश चौधरी को मरणोपरांत इस वर्ष (2021) पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। सरकार ने उन्हें यह पुरस्कार समाज सेवा के क्षेत्र में उनके कार्यों के लिए मान्यता के रूप में दिया है। जगदीश चौधरी ने सामाजिक सद्भाव की दिशा में काम किया और उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के नाम का प्रस्ताव रखा।

गुलफाम अहमद

पद्मश्री से सम्मानित किये जाने वाले दिगज्जों की श्रेणी में एक और नाम बेहद ख़ास सरोद और रबाब वादक उस्ताद गुलफाम अहमद जी का है। 66 वर्षीय गुलफाम अहमद मूल रूप से उत्तरप्रदेश के निवासी हैं और 2001 से रबाब और सरोद बजा रहे हैं। वह 2009 और 2014 के बीच अफगानिस्तान में रहे,नई दिल्ली और काबुल के बीच अपना समय बांटने वाले खान ने 250 अफगान नागरिकों को वाद्य सिखाया है और 50 अन्य उनके संरक्षण में हैं। उनके कौशल ने उन्हें अफगानिस्तान में बहुत सम्मान दिलाया, जहां लोग उन्हें उस्ताद कहते हैं। गुलफाम अफगानिस्तान में भारत के सद्भावना के राजदूत बन गए हैं।

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