हर साल जब पहली बरसात की बूँदें मिट्टी पर पड़ती हैं तो एक सोंधी सी खुशबू निकलती है और इस खुशबू से हम सबकी अनेक यादें जुडी हुई हैं। हर साल बरसात के साथ यह भीनी भीनी मिट्टी की खुशबू हमारी यादों को और हरा भरा करती है। लेकिन भारत में उत्तर प्रदेश के शहर कन्नौज के लिए गीली मिट्टी की इस सोंधी खुशबू को महसूस करने का सिर्फ एक मौसम पर्याप्त नहीं था। इसलिए उन्होंने एक छोटी सी बोतल में बारिश की इस खुशबू को कैद करने एक तरीका खोज निकाला। जी हाँ,हम बात कर रहे हैं भारत की इत्र राजधानी के रूप में प्रसिद्द कन्नौज शहर की जहाँ की मिट्टी से बना ‘मिट्टी अत्तर’ और इसे बनाने वाली तकनीक कई सदियों पुरानी है।

इत्र राजधानी कन्नौज का खुशबुओं से सम्बन्ध

कन्नौज शहर गुलाब, मेंहदी, शाममा मेंहदी, मोगरा, बेला और मिट्टी अत्तर जैसे छह मनमोहक इत्रों में माहिर है। हर सुबह स्थानीय किसान गुलाब, चमेली, चम्पाका, कमल, जिंजर लिली, गार्डेनिया, और दर्जनों अन्य जैसे विभिन्न प्रकार के फूल उठाते हैं और उन्हें शहर में दो सौ से अधिक इत्र डिस्टिलरी में पहुंचाते हैं। कन्नौज के इत्र मुगल सम्राटों के बीच प्रसिद्ध थे जिन्होंने लगभग 300 वर्षों तक भारत पर शासन किया था। लगभग 1300 साल बाद, कन्नौज के 15 लाख निवासियों में से लगभग आधे अभी भी पारंपरिक तरीकों का उपयोग करके सुगंध निर्माण में शामिल हैं। यहाँ पर बनने वाला मिट्टी की खुशबू वाला इत्र इन सब में सबसे अनोखा है।

मिटटी की खुशबू को एक शीशी में कैद करने की प्रक्रिया

मिट्टी से बनने वाले और अन्य इत्रों को बनाने की प्रक्रिया में ज्यादा अंतर नहीं है। सबसे पहले मिट्टी को तांबे के बड़े-बड़े पात्रों में पकाया जाता है, फिर आसवन की प्रक्रिया द्वारा पकाई गई मिट्टी की खुशबू को बेस ऑयल के साथ संघनित किया जाता है। इस प्रक्रिया से बेस ऑयल में मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू घुल जाती है। मिट्टी से पूरी सुगंध निकलने में छह से सात घंटे लगते हैं। मिट्टी अत्तर का उपयोग सुगंध, एयर फ्रेशनर, आवश्यक तेल – और अरोमाथेरेपी में किया जाता है, क्योंकि इसकी खुशबू एक शांत अनुभव प्रदान करती है। इसे इतर-ए-खाकी भी कहा जाता है।

इन सभी इत्रों को भारत सरकार के जीआई एक्ट 1999 के तहत कन्नौज परफ्यूम्स के भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग के तहत संरक्षित किया गया है। आज, यदि आप कन्नौज से गुजरते हैं, तो आप अभी भी पुराने इत्र के टूटे हुए घरों के सदियों पुराने पहलुओं को देख सकते हैं जो पूरे शहर को मध्ययुगीन अनुभव देते हैं। 250 से अधिक इत्र के घरों के साथ, जिनमें से कई विलुप्त होने के कगार पर हैं, ऐसा लगता है कि पूरा कन्नौज अत्तर बनाने की एक या दूसरी प्रक्रिया में लगा हुआ है।

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