इलाहाबाद जंक्शन के करीब स्थित खुसरो बाग़ (Khusro Bagh) दिवारों से अच्छी तरह से घिरा हुआ एक ऐतिहासिक स्मारक है। यहां जहाँगीर (Jahangir ) के बेटे ‘सुल्तान खुसरो’ तथा खुसरो की बहन ‘निसार बेगम’, खुसरो की माँँ ‘शाह बेगम’ तथा बीवी ‘तामोलन’ का मकबरा है। इस बाग़ में स्थित कब्रों पर करी गयी नक्काशी देखते ही बनती है जो मुग़ल कला संग स्थापत्य कला का एक जीवंत उदाहरण है। इन्हें 17वीं शताब्दी में यहां दफनाया गया था। बाग़ की उत्कृष्ट और अलंकृत वास्तुकला एक समृद्ध समय की कहानी बयान करती है और वर्तमान समय में यहां 14.5 हेक्टेयर मेंं फैली राजकीय पौधशाला की हरियाली भी आगंतुकों को सुकून प्रदान करती है।

खुसरो बाग़ का इतिहास 

खुसरो बाग, अकबर के पोते को समर्पित एकमात्र स्मारक है जो भारत का सम्राट हो सकता था। जबकि राजकुमार शाहजहाँ (Shah Jahan) बहुत प्रसिद्ध है, यह उसका बड़ा भाई था जिसे अकबर सिंहासन पर देखने के लिए उत्सुक था। राजकुमार खुसरो जहाँगीर के सबसे बड़े पुत्र थे और उनकी राजपूत पत्नी मान बाई आमेर की राजकुमारी थीं। उनका जन्म 1587 ईसवीं में हुआ था और खुसरो बड़ा होकर एक बुद्धिमान व्यक्ति बने जो एक महान योद्धा और दरबार के चहेते थे।

कहा जाता है कि वर्ष 1605 में अकबर के इंतकाल के बाद उसके पुत्र सलीम उर्फ जहांगीर ने सैरगाह के रूप में खुसरो बाग का निमार्ण कराया था। जहांगीर के मुख्य वास्तुशिल्पी रहे अका रजा ने बाग के साथ ही यहां बने मकबरों का नक्शा तैयार किया था जिसके आधार पर निर्माण किया गया। जहां पर जहांगीर के ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा खुसरो और उसकी मां शाह बेगम को दफनाया गया, जबकि खुसरो की बहन सुल्तान बेगम का मकबरा तो यहां पर बना है किंतु उसे यहां दफनाया नहीं गया है। जहाँगीर के बड़े बेटे को उसके भाई शाहजहां द्वारा मार दिया गया था इसलिए उसकी मां ने आत्महत्या कर ली थी. सम्राट ने इन कब्रों और मकबरे को बनवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह बगीचा अपने आम और अमरूद के बगीचों के लिए प्रसिद्ध है। 

मुगलकालीन वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट नमूना है खुसरो बाग़

खुसरो बाग़ 67 एकड़ क्षेत्रफल में बना है। इसके चारों तरफ लाल पत्थर की ऊंची दीवारें हैं। यह मुगल स्थापत्य कला का उत्कृष्ट नमूना है। मकबरों की छत व दीवारों पर पेंटिंग के साथ पच्चीकारी भी की गई है। अष्टकोणीय आकार की इमारत पर बनाए गए गुंबद देखने लायक हैं, गुंबद पर गोल वृत्त और तारे बनाए गए हैं जबकि मकबरे भीतरी हिस्सों को फूल और पेड़ों के चित्रों से सजाया गया है। मकबरों के कोनों पर छोटी-छोटी छतरियां भी बनी हैं। 

1857 के विद्रोह में खुसरो बाग़ की भूमिका 

1857 के विद्रोह के दौरान क्रांति की चिंगारी इलाहाबाद ही नहीं बल्कि इसके आसपास के गांवों में भी फूटी थी। इस चिंगारी को हवा देने का काम चायल क्षेत्र के जागीरदारों एवं आम जनता ने किया था। क्रांति की शुरूआत होने की जानकारी इलाहाबाद में 12 मई 1857 को आ गई थी। यहां इस लड़ाई का नेतृत्व मौलाना लियाकत अली ने किया था। लियाकत अली ने उस समय ऐतिहासिक खुसरो बाग को स्वतंत्र इलाहाबाद का मुख्यालय बनाया था और अंग्रेज़ी हुकूमत से बगावत की शुरूआत भी। खुसरो बाग़ कई युद्धों,उत्पीड़न और रक्तचाप का साक्षी रहा है।

खुसरो बाग़ एक ओर जहां मुगल कला का उत्कृष्ट नमूना है तो वहीं राजकीय पौधशाला की हरियाली लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है। संगम नगरी में सुुुकून की तलाश में लोग बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं। इस पौधशाला में उन्नत किस्म के पौधों का तैयार किया जाता है, अपनी विविधता के कारण दूर-दूर से पर्यटक यहां सैर सपाटे के लिए पहुंचते हैं। इस पौधशाला में मुख्यता इलाहाबाद के विश्व प्रसिद्ध अमरूद तथा आम की कई प्रजातियां मौजूद हैं जिसके पौधें लोग दूर-दूर से खरीदने के लिए यहां आते हैं। 

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