हाल ही में इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर कलाकार मिनिएचर पेंटिंग या लघु चित्रों और चीत्कारी की कला करते नज़र आये हैं, जैसा कि विशेष रूप से कोरोना के समय में लॉकडाउन के दौरान देखा गया है। हालाँकि, पेंटिंग की यह शैली नई नहीं है, मुगल दरबार और अवध के कलाकारों के लिए, इस कला का अभ्यास,सोशल मीडिया ट्रेंड बनने से बहुत पहले किया गया था। नादिर शाह द्वारा दिल्ली को लूटने और मुगल दरबार के कारीगर अवध आ गए, जहां उन्होंने धीरे-धीरे नवाबों का संरक्षण प्राप्त किया और लघु चित्रकला शैली अधिक ऊंचाइयों पर पहुंच गई। जबकि लोग अभी भी इस बात पर बहस करते हैं कि क्या इस तरह के रचनात्मक प्रयासों को अलग से ‘अवध स्कूल ऑफ पेंटिंग’ के रूप में माना जा सकता है लेकिन इस तरह संस्कृतियों के संलयन से पनपने वाली कलाएं वास्तव में जानने योग्य हैं।

अवध स्कूल ऑफ पेंटिंग से जुडी जानकारी 

अवध में प्रचलित लघुचित्रों की प्रमुख शैलियों का पता नवाब शुजा-उद-दौला के शासनकाल से लगाया जा सकता है, हालाँकि, इसे आमतौर पर लखनऊ के बाद के प्रांतीय मुगल स्कूल के रूप में जाना जाता है। 1863 में लखनऊ में स्थापित राज्य संग्रहालय का भ्रमण आपको ढेर सारे लघु चित्रों से परिचित कराएगा और ये कलात्मक प्रयास आपको विश्वास दिलाएंगे कि अवध चित्रकला का एक स्कूल वाकई मौजूद है।

एक ओर, कुछ विद्वान अक्सर दावा करते हैं कि मुगल लघुचित्रों और अवध लघुचित्रों की शैली में कोई स्पष्ट अंतर नहीं देखा गया है, इसलिए, दोनों को एक ही श्रेणी में रखा गया है। दूसरी ओर, कुछ शोधकर्ताओं का विचार है कि अवध लघुचित्र भारतीय चित्रकला की अन्य शैलियों से अलग हैं। इस अंतर को इस्तेमाल किए गए रंगों के पैलेट के माध्यम से हाइलाइट किया गया है।

अवध लघुचित्रों को चित्रित करने वाले प्रमुख कलाकार

गजराज सिंह, आसफ अली खान, गुलाम मुस्तफा, मोहम्मद मसूद, मोहम्मद वजीर, हसन अली और जहान अली खान, सात प्रमुख कलाकार हैं जिन्होंने अपने लघु चित्रों में एक स्वतंत्र शैली का प्रदर्शन किया! इन साथ कलाकारों द्वारा बनाये गए चित्रों में नवाबों के ख़ाली समय का एक चित्रण हैं, जिसमें विभिन्न रस, नृत्य, नाटक और बहुत कुछ दर्शाया गया है।

नॉक नॉक 

अपनी अलग पहचान के संबंध में मौजूदा भ्रम के बावजूद, अवध के लघु चित्र एक प्रकार की स्पष्टवादिता को दर्शाते हैं जो वास्तव में दुर्लभ है। इस खुलेपन का श्रेय अक्सर नवाब शुजा-उद-दौला को दिया जाता है, जो न केवल एक शासक या इन चित्रों का विषय थे, बल्कि एक ऐसा कलाकार भी थे, जिन्होंने यह उम्मीद नहीं की थी कि रचनात्मकता को ढोंग से बदनाम किया जाएगा।

यदि आप एक कला प्रेमी हैं, तो हम आशा करते हैं कि यह लेख आपको स्वयं तय करने में मदद करेगा कि अवध चित्रकला की पहचान, दिल्ली शैली की चित्रकला से अलग है या नहीं।

इनपुट- सुगंधा पांडेय 

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए- https://www.knocksense.com/lucknow/awadh-school-art-miniature-paintings

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