लखनऊ शहर कलात्मक प्रतिभा और समृद्ध अतीत से भरा हुआ है,लखनऊ में ‘बड़ा इमामबाड़ा’ और ‘छोटा इमामबाड़ा’ अपनी दीवारों के भीतर इतिहास की अनगिनत कहानियों को समेटे हुए हैं। मूल रूप से सामुदायिक परिसरों के रूप में स्थापित, ये इमारतें शहर और उसके निवासियों की अद्वितीय तरीके से सेवा करने के लिए विकसित हुई हैं। जबकि दोनों इमारतें शहर के पर्यटन मंडल के जगमगाते रत्न हैं,1960 की बाढ़ हो या वर्तमान महामारी जैसी संकट की इन घड़ियों के बीच, इन इमारतों का योगदान निश्चित रूप से उल्लेखनीय रहा है। 

इस ऐतिहासिक इमारत ने 1960 की बाढ़ से वर्तमान महामारी तक शहर की रक्षा की है 

इतिहास से पता चलता है की 1784 में जब अवध एक घातक अकाल से घिरा हुआ था, तब स्थिति की गंभीरता को समझते हुए, नवाब आसफ-उद-दौला ने सभी के लिए रोजगार और आजीविका के अवसर प्रदान करने के लिए बड़े इमामबाड़ा के विचार की शुरुआत की थी। बाद में जब 1960 में शहर में भयंकर बाढ़ आई, तो परिसर की ऊंची इमारतों और घने बाड़ों ने लखनऊ के लिए रक्षक के रूप में काम किया। ऐसा कहा जाता है कि उस कठिन समय के दौरान शहरवासी बड़ी संख्या में इसके हॉल में रुके थे।

आज छोटा इमामबाड़ा ही शहर को बचाने के लिए आगे आया है। एक टीकाकरण केंद्र में बदला गया यह परिसर इस समय लोगों को यूपी के टीकाकरण अभियान के दायरे को बढ़ाने रहा है और कई लोगों के जीवन की रक्षा कर रहा है। यह भी कहा गया है कि एक धार्मिक स्थान को टीकाकरण स्थल में बदलने से समाज में जागरूकता फैलाने में मदद मिलेगी। ‘रोशनी का महल’ कहा जाने वाला यह भव्य ढांचा अब जीवन की मशाल को थामने में मदद कर रहा है।  

Knock Knock

जबकि स्मारकीय इमारतों की प्रशंसा करने का कोई तरीका काफी नहीं है, लेकिन हमें लखनऊ की विरासत के प्रतीकों की सुरक्षा करने की आवश्यकता को समझना चाहिए। हमे कोशिश करनी चाहिए की हम इन भव्य इमारतों के बारे में जागरूकता फैलाएं। इसके इलावा, प्रशासन को पर्याप्त कदम उठाने की जरूरत है ताकि इमारतें समय से होने वाले बदलावों की बर्बादी से अछूती रहें।

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