नवाबों के शहर में विकास के इस नए युग के साथ, यहां के कुछ पुराने खजाने इतिहास के कोनों में कहीं छुप गए हैं। अतीत के इन रत्नों के बीच लखनऊ का शेर दरवाजा है, जो कैसरबाग में ग्लोब पार्क के दक्षिणी छोर पर स्थापित है। सफेद और लाल रंग से रंगे हुए घने बाड़े के ऊपरी हिस्से पर बाघों का एक जोड़ा बैठा है, जिस कारण इसे टाइगर गेटवे का नाम दिया गया है। यह दरवाज़ा डेढ़ सौ साल पहले निर्मित, शेर दरवाजा कई सारी ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है!

भारतीय और ब्रिटिश शहीदों की दिलचस्प कहानियां


ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, 1857 के विद्रोह से पहले इस जगह के आसपास एक समृद्ध कॉलोनी और एक बाजार था। इसके अलावा, स्मारक में एक दर्जन प्रतिष्ठित इमामों की कब्रें भी शामिल थीं। दशकों पहले जिस जगह पर अधिक आवागमन हुआ करता था, वह अब पूरी तरह से सुनसान है! आज के समय में बिना किसी पूर्व जानकारी के यदि इस परिवेश में आप घूमेंगे, तो यह कल्पना करना कठिन होगा कि क्या यह स्थान कभी भी उतना व्यस्त था भी जैसा कि आज के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में होने का दावा किया जाता है।

1857 के सिपाही विद्रोह में एक केंद्रीय स्थान लेते हुए, शेर दरवाजा कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह बना। इतिहास की किताबों के अनुसार इसी गेट के पीछे विद्रोहियों ने ब्रिगेडियर जनरल नील को मार गिराया था। संरचना के करीब स्थित, एक पत्थर का स्मारक था जहां हमला करने के बाद घायल सैनिक गिर गया था। शहीद जनरल की याद में ब्रिटिश सेना के अधिकारी इसे नील गेट कहने लगे। इसके अलावा हजरतगंज से छतर मंजिल की ओर जाने वाली सड़क का नाम भी नील रोड रखा गया। यह उल्लेखनीय है कि भारतीय शहीदों की मान्यता में शेर दरवाजा नाम आज भी मौजूद है। यह कई बहादुरों की कहानियों का प्रतीक है जिन्होंने अपनी मातृभूमि को गुलामी और से मुक्त करने के लिए अपने जीवन की कुर्बानी दी।

नॉक-नॉक

भविष्य की ओर अपना मार्ग प्रशस्त करते हुए, हमें अपने अतीत की यादों की सराहना करना नहीं भूलना चाहिए। अगर हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां ऐसी कहानियों से सीखें, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि इतिहास के इन गढ़ों को संरक्षित रखा जाए।