सांस्कृतिक रूप से देश की धरोहर होने के अलावा, लखनऊ शहर कलाकारों और कारीगरों का भी घर है, जो कला और लोगों के इस्तेमाल के उत्पादों को हाथों से सदियों से बनाते आये हैं और उनकी कला और कौशल उनके लिए किसी भी कीमत से बढ़कर है। हाल के वर्षों में, विशेष रूप से बड़े पैमाने पर उत्पादित उत्पादों पर बढ़ती निर्भरता के साथ, हस्तशिल्प उद्योग में लगातार गिरावट देखी जा रही है।

आप में से बहुत से लोग इस बात से अवगत नहीं होंगे की लखनऊ में एक गली ऐसी भी है जिसे 'कंघी वाली गली' के नाम से आज भी जाना जाता है। इस गली में आज से लगभग 30 से 40 साल पहले लकड़ी और सींग को आरी से बारीक काटकर कंघियाँ बनायीं जाती थीं और एक कंघी की कीमत उस समय करीब 2 रुपये से लेकर 5 रुपये तक हुआ करती थी।

आज से 40 साल पहले भैंसो के सींग से बनाई जाती थी कंघियाँ



65 वर्ष के स्थानीय निवासी मोहम्मद सिद्दीक जिनकी पैदाइश और पालन पोषण दोनों लखनऊ में ही हुआ है वे पहले हाथों से कंघी बनाने का काम करते थे और आज भी कंघी बनाने और बेचने का काम कर रहे हैं। बस फर्क इतना है की पहले वे शौक से अपने हाथों से लड़की की कंघियाँ बनाते थे लेकिन अब जीवनयापन के लिए मजबूरन प्लास्टिक की कंघी बेचने पर मजबूर हैं।

यहियागंज चौराहे के पास कंघी वाली गली में मोहम्मद सिद्दीक आज भी एक चारपाई पर अपनी कंघी की दुकान लगाते है. लेकिन पहले के मुकाबले,आज के दौर में बहुत बड़ा परिवर्तन आ चुका है पहले वे अपने हाथों से भैंस और भैंसे की सींगों से कंघी बनाते और बेचते थे, वहीं आज टेक्नोलॉजी और आधुनिकता के दौर में प्लास्टिक से बनी कंघियों बेचने पर मज़बूर है, जिससे वे बड़ी मुश्किल से अपना जीवन यापन कर पाते हैं। उन्होंने बताया की पहले वे हाथ से कंघी बनाते थे,और आरी और विभिन औजारों की मदद से कंघियों को कढ़ाई और सुन्दर नक्काशी से सजाते थे।

उन्होंने बताया आज से करीब 30 साल पहले लोग इन हाथ से बनी कंघियों का खूब इस्तेमाल करते थे और बहुत दूर दूर से लोग यहां कंघियाँ खरीदने आते थे। लेकिन धीरे धीरे ज़माना बदलता गया, आधुनिकता के दौर में हाथ से बनाई जाने वाली कंघियों की कला भी पूरी तरह लुप्त हो चुकी है और वे बोले की "हाथ से कंघी बनाने की कला के लुप्त होने का सबसे बड़ा कारण है की, जिन लोगों को इस कला के बारे में जानकारी थी उन्होंने आगे लोगों को,अपने बच्चों को यह जानकारी दी नहीं और अधिकतर लोग जो इस काम से जुड़े थे उनमें से एक दो लोगों को छोड़कर बाकी कोई भी अब इस दुनिया में नहीं रहे। और जो लोग आज भी ज़िंदा है वो सब भी प्लास्टिक की कंघियों को ही बेच कर अपना गुज़ारा कर रहे हैं।

अफ़सोस की बात है की आगे आने वाली पीढ़ियां भी हमारी तरह इन हाथ की कला को लखनऊ की विलुप्त होती कलाओं के विषय पर लिखी गयी किसी किताब या लेख में केवल पढ़ पाएंगे लेकिन कभी उन्हें बनता हुआ देख नहीं पाएंगे न ही कभी उन्हें खुद बनाने का प्रयास कर पाएंगे।

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