दुनिया भर में, लखनऊ शहर का अपना महत्व और मान्यता है, और शहर की इस शानदार और उल्लेखनीय मान्यता के अनिवार्य कारण यहां की तहज़ीब, त्योहार और सद्भाव हैं। लखनऊ के नवाबों और प्यार करने वालों ने शहर को शिष्टाचार (तहज़ीब) के एक संस्थान में बदल दिया, और यहां का सांप्रदायिक सौहार्द इतना आदर्श और अनुकरणीय है, जिसे हम रंगों के त्योहार होली में बखूबी देख सकते हैं।

रंगों का त्योहार नवाबों के साथ-साथ आम लोगों का भी पसंदीदा त्योहार था। आज भी, शहर में अलग-अलग धार्मिक आस्‍थाओं के साथ आनंद, उत्साह और ऊर्जा से होली मनाई जाती है, और यही कारण हैं कि लखनऊ को अनुकरणीय सांप्रदायिक सद्भाव, और गंगा जमुनी तहज़ीब के साथ शांतिप्रिय शहर के रूप में जाना जाता है।

होली के दिन लखनऊ के लोग विस्तृत उत्सव मनाते हैं। बच्चों के साथ-साथ वयस्क भी "गुलाल" के रूप में जाना जाने वाला रंगीन पाउडर फेंकने जाते हैं, और सभी राहगीरों को रंगीन पानी से सराबोर कर देते हैं। इस अवसर पर बहुत सारी मिठाइयां और विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं, गुझिया और पापड़ जिसमें सबसे अहम् हैं।

टेसू के फूल से बनते थे रंग



पहले फूलों और सब्जियों से रंग बनाए जाते थे। ज्यादा गुलाब के फूल, सब्जियों और टेसू के फूल से रंग बनते थे। इनमें से खुशबू आती थी और ये आसानी से छूट भी जाते थे। इन रंगो से त्वचा को नुकसान भी नहीं होता था।

पुराने लखनऊ के केंद्र, 'चौक' की होली तो शुरुआत से पूरे अवध में मशहूर है, खासकर ठंडाई और भांग के लिए। यहां होली में ढोल-नगाड़े के साथ बारात निकलती थी। एक दौर में 'लालजी टंडन' और 'अमृतलाल नागर' जैसे नामचीन लोग 'राजा की ठंडाई' और भांग पीने जुटते थे। यही नहीं शहर के दूसरे इलाकों के भी लोग इस आयोजन में शरीक होते थे।

काव्य रचनाओं में होली के उत्सव के अंश मौजूद हैं।



लखनऊ के नवाबों को शहर के सांस्कृतिक और धार्मिक सद्भाव का श्रेय दिया जाता है। अवध के नवाब अपनी शानदार होली समारोह के लिए जाने जाते थे। दरअसल लखनऊ की उर्दू शायरी इस त्‍योहार का वसीयतनामा है। लखनऊ के कई कवियों ने अपनी रचनाओं में होली के त्‍योहार के दृश्यों को सुंदर छंदों में पिरोया है।

जब अतुलनीय कवि, मीर लखनऊ से दिल्ली आए, तो उन्होंने नवाब, आसिफ-उद-दौला को रंगों के त्यौहार को इतने उत्साह के साथ मनाते हुए देखा की उन्होंने लखनवी होली पर एक पूरी मसनवी लिखी।

'होली खेले आसफुद्दौला वजीर,

रंग सौबत से अजब हैं खुर्दोपीर

दस्ता-दस्ता रंग में भीगे जवां

जैसे गुलदस्ता थे जूओं पर रवां

कुमकुमे जो मारते भरकर गुलाल

जिसके लगता आन कर फिर मेंहदी लाल'

यही नहीं कई अन्य कवियों की भी रचनाएं भी होली की उमंग से वंचित नहीं रह पायीं, उनमें सआदत यार खान "रंगीन" और उस्ताद ख्वाजा हैदर अली "आतिश" भी शामिल हैं।

अवध के आखिरी नवाब, वाजिद अली शाह, स्वयं एक प्रमुख होली उत्साही थे। उन्होंने न केवल होली को उत्साह के साथ खेला, बल्कि कई रचनाएँ भी लिखी हैं।

और सभी लखनऊवासियों के लिए यह गर्व की बात है, कि तहज़ीब वाली इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, और यह हमारी ज़िम्मेदारी है की हम उस संस्कृति को बनाएं रखें, जिसने हमे दुनिया भर में एक विशेष पहचान दी।

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