उत्कृष्ट कला और वास्तुकला की एक समृद्धिशाली कहानी को दर्शाता हुआ लखनऊ शहर का इतिहास कई प्रकार की उत्तम कलात्मक तकनीकों को प्रदर्शित करता है। इनमें से एक बिदरी की धातु शिल्प कला है, जो वर्षों से क्षेत्र की रचनात्मकता और भव्यता का एक वसीयतनामा रही, पर समय की घुमावदार राहों में कहीं खो गयी। शहर के कुछ पुरातन घरों की आंतरिक सजावट की शोभा बढ़ाती हुई, यह कलाकृति अवध के एक शानदार और समृद्ध अतीत का प्रतीक है। जबकि इस कला में चांदी के तारों का अधिकतम उपयोग देखा गया है, लेकिन सोने और कांस्य पर इसका उपयोग देखकर आप मन्त्रमुग्ध हो जाएंगे।

लखनऊ की ओर जाने से पहले ईरान से हैदराबाद तक का सफर।



लोककथाओं के अनुसार यह प्रचलित है की यह हैदराबाद के पास 'बिदर' नामक शहर से निकली थी इसीलिए इसका नाम बिदरी पड़ा। यदि आप इस कला के मूल स्त्रोत को खोजेंगे तो आपको यह जानकारी मिलेगी की बिद्री की कला का स्त्रोत मूलतः ईराक़ में हैं। प्रारंभिक रूप से यह कला तलवारों और कटलरी पर सजाने के लिए इस्तेमाल की जाती थी जो बाद में कई प्रकार के कलाकृतियों के कवर और अलंकरणों तक विस्तारित हुआ। यह कला जटिल और बनाने में मुश्किल है लेकिन तैयार उत्पाद को निहारना बेहद सुरम्य है। चमकदार सतह पर चमकते चांदी के डिज़ाइन आंखों को आकर्षक लगती हैं और जहां रख दिए जाएँ उस स्थान की शोभा बढ़ाती हैं।

तराशी, आफताबी, तहन्शी और ज़हन्नशी जैसी विभिन्न शैलियों में लोकप्रिय, यह कला व्यापक रूप से लखनऊ में ज़रबुलन्द की क्राफ्टिंग पद्धति के लिए जाना जाती है। लखनऊ के बनारसी बाग में एक संग्रहालय में रखे हुक्के और बर्तनों के बाहरी हिस्सों की शोभा को बढ़ाती हुई, बिदरी कला कई शताब्दियों से पूरी तरह से संरक्षित है। हालाँकि, लखनऊ में बिदरी के आगमन के सही समय का पता नहीं लगाया जा सका है, लेकिन यूरोपीय डिज़ाइनों के उपयोग से संकेत मिलता है कि कला ने उस समय शहर में अपनी जगह बनाई थी जब मुगलों और नवाबों ने ब्रिटिश और फ्रांसीसी अधिकारियों का अपने दरबार में स्वागत किया था।

18वीं शताब्दी में कोलकाता की प्रदर्शनी में प्रदर्शित।



बिदरी के शुरूआती उल्लेख हमें बताते हैं कि बिदरी की कलाकृतियां 1883 - 84 में कोलकाता में एक प्रदर्शनी में प्रदर्शित की गयी थीं। लंदन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, यह कहा गया है कि लखनऊ में 1885 में बिदरी के कामों में 31 कारीगर शामिल थे, और इस कला उद्योग ने उस दौरान महत्वपूर्ण लाभ कमाया। बिदरी कला में डैमसीनिंग शामिल है जो एक धातु को दूसरे के साथ कोटिंग करके अंडरकटिंग और हैमरिंग करने का शिल्प है।

बर्तनों के अलावा, कला का उपयोग पेन स्टैंड, ट्रे, बटन, पेपरवेट, पिन और बहुत सारे अन्य आवश्यक सामानों पर किया जाता था। इस कला और ज़रबुलन्द में प्रचलित डिजाइन पुष्प, बेल लताएं, फल, मछली डिजाइन, शिकार के दृश्य, पशु, पक्षी और प्रकृति से हैं। प्राथमिक रूप से मजदूरों के लिए प्रकृति के दृश्य पसंदीदा थे जो आज भी कारीगरों को प्रेरित करते है। एक विशिष्ट डिज़ाइन में मानव आकृतियां, वनस्पतियां और जीव शामिल हैं जो ज़ारबुलंद कलाकृति या बिदरी कलाकृति पर सुंदर दिखते हैं।

लखनऊ की बिदरी देश भर के संग्रहालयों में स्थित है



आज शहर की ज़रबुलन्द बिदरी को कोलकाता के भारतीय संग्रहालय, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय, हैदराबाद के सालार जंग संग्रहालय, मुंबई संग्रहालय और लखनऊ के राज्य संग्रहालय सहित अनेक आर्ट गैलरी और संग्रहालयों में देखा जा सकता है। दिलचस्प बात यह है कि इस कला ने अंतरराष्ट्रीय प्लेटफार्मों की यात्रा करके लखनऊ शहर का नाम रोशन किया। इसकी उल्लेखनीय यात्राओं में से एक है 1980 में लंदन में आयोजित '100 इयर्स ऑफ इंडियन आर्ट' प्रदर्शनी जहां इस सौंदर्यपूर्ण कला ने अपनी उपस्थिति दर्ज की।

नॉक नॉक (Knock Knock)



लखनऊ शहर हमेशा से शिल्पकला का एक उत्साही प्रवर्तक रहा है। नवाब शिल्प के शौकीन थे और उन्होंने इसका समर्थन किया जिसके परिणामस्वरूप कला के विभिन्न केंद्र यहां स्थापित किए गए। हालांकि औद्योगिक क्रांति अपने साथ उल्लेखनीय लाभ लेकर आयी लेकिन इसने निस्संदेह बिदरी जैसी स्थानीय कला रूपों पर हानिकारक प्रभाव डाला है। तेजी से उभरते इनोवेशन के साथ हमारे बढ़ते जुनून के बीच, हम अक्सर इतिहास और विरासत में सुरक्षित चमत्कारों का सम्मान करना भूल जाते हैं। इसीलिए न केवल सुरक्षित रखना बल्कि बिदरी जैसे कला रूपों को पुनर्जीवित करना भी बेहद आवश्यक है।

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