अमीनाबाद की हलचल भरी गलियों से शायद ही लखनऊ का कोई ऐसा शख्स हो जो वाकिफ न हो। अपनी ओर लोगों को बुलाते हुए ठेलेवाले, यात्रियों को लेकर जगह ढूंढने में संघर्ष से गुज़रते हुए वाहन, संकरी गलियों की रंग बिरंगी दुकाने, खाने के ठेले और इन सब से जुड़े हुए अनेक रंग और आवाज़ें ही हैं जो अमीनाबाद को शहर का सबसे अद्भुत और विचित्र इलाका बनाती हैं। अमीनाबाद में कई विचित्र नामों वाली संकरी गालियां हैं खाने की, कपड़ों की, रोज़मर्रा से लेकर साज सजावट के सारे सामान से भरी गलियां हैं, जो शहर में खरीदारी का केंद्र होने के साथ शहर के इतिहास का प्रतीक भी है।



ऐसी ही एक गली है जिसका नाम 'तस्वीर वाली गली', जो आधुनिक कला और पुराने समय के आकर्षण का मिश्रण है। कुछ 12 से 15 दुकानों के साथ एक संकीर्ण गली, जो आपके कलात्मक सभी कार्यों, तस्वीरों, प्रमाण पत्रों को तैयार करने को समर्पित हैं। आप यहां से अपने घर के लिए फ़्रेमयुक्त प्रिंट और हस्तनिर्मित कला भी चुन सकते हैं। इसके साथ आपको देवताओं, कुरान के छंदों की तस्वीरें के साथ -साथ, सस्ती आधुनिक कला, धातु की शीट आर्ट, फैंसी पेंटिंग, थ्रेड वर्क आर्ट, कैनवस पेंटिंग - सभी फ़्रेमयुक्त और बिक्री के लिए प्रदर्शन पर भी बिकती हैं। लेकिन हम आपको बता दें की अगर आप अमीनाबाद के बाजार और इसकी गलियों से वाकिफ नहीं है तो शायद आप इस गली को न ढूंढ पाए। जब आप लखनऊ के अमीनाबाद चौराहे पर पहुंचेंगे तो वहां आपको इस भीड़ भाड़ वाले इलाके में जहां पूरी सड़क एक बाज़ार के रूप में नज़र आती है, वहां से चंद कदम की दूरी पर आगे जाकर आपको ये 'तस्वीर वाली गली' मिलेगी।

इस छोटी सी गली में सालों से कई पुरानी दुकानें है जो आज भी चल रही है, अपना व्यापार कर रही है। कुछ दुकानें यहां सन 1942, 1950 और 1951 से आज भी मौजूद है, और पीढ़ी दर पीढ़ी इन दुकानों पर आज भी तस्वीरों की फ्रेमिंग का काम चल रहा है. तस्वीरों की फ्रेमिंग करने के लिए कार्डबोर्ड, कांच, लकड़ी, एलुमिनियम और कई तरह के डिज़ाइनर चार्ट पेपर का इस्तेमाल होता है। यहां बेहतर दाम और बढ़िया क्वालिटी के छोटे से छोटे फ्रेम हो, या बड़े से बड़े हॉल साइज के फ्रेम भी आपको बहुत ही आसानी से मिल जाएंगे। फ्रेम की कीमत उसके साइज और क्वालिटी पर निर्भर करती है।

1942 से है गोपाल दास सुशील कुमार जी की दूकान।



गोपाल दास सुशील कुमार दुकान के मालिक राजकुमार गुप्ता नें Knocksense से बात करते हुए बताया की, लॉकडाउन के बाद काम पूरी तरह बंद है, या ये समझिये काम आधा हो गया है, लोग आते नहीं हैं और और फ्रेम बनाने का सामान भी महंगा होता जा रहा है, ऐसे में माल की आपूर्ति हो नहीं रही, दाम भी बढ़ते जा रहे है, ऐसे में काम है नहीं कमाई भी कुछ खास है नहीं।

उन्होंने बताया की इस गली में फ्रेम बनवाने बहुत दूर दूर से लोग आते है, खासकर के आस पास के जिले के लोग जिनमें, सीतापुर, लखीमपुर, प्रतापगढ़, अमेठी , जगदीशपुर, रायबरेली और आस पास के सभी जिले। इसके साथ ही लखनऊ के लोकल लोग भी यहां अपना फ्रेम बनवाने आते है। इस गली में जितनी भी दुकानें है, वो सभी दूसरी या तीसरी पीढ़ी आज भी चला रही है और इस काम को शान से कर रहे है।


आपको यहां देवी - देवताओं की फोटो और फ्रेम, धार्मिक फ्रेम, मॉडर्न आर्ट, पेंटिंग, निजी तस्वीरों के लिए फ्रेम छोटे से बड़े तक, सब कुछ यहां बढ़िया क्वालिटी और उचित दाम में मिल जाएगा। आज के आधुनिक ज़माने की कंप्यूटर ग्राफ़िक से बने हुए डिज़ाइन, आर्ट, लैंडस्केप्स, फ्लोरल पैटर्न, भी आपको यहां मिल जायेंगे जिन्हे खरीद कर आप अपने घर की रौनक को बढ़ा सकते है, या किसी को उपहार के रूप में भेंट कर सकते है। तस्वीर वाली गली में आपको तस्वीरों और फ्रेम का ऐसा मिलन जोड़ लखनऊ में कहीं और देखने को नहीं मिलेगा। पहले के ज़माने में फ्रेम बनाने का काम, उसकी कटाई, नपाई का काम हाथों से होता था, लेकिन आज टेक्नोलॉजी के ज़माने में बहुत सारा काम मशीन से जल्दी और बड़ी आसानी से हो रहा है।

इस तस्वीर वाली गली में सालों से केवल तसवीरें और फ्रेम्स बनाकर बेंचे ही नहीं जाते, बल्कि इस कला के ज़रिये इस गली का अंश लोगों की खुशियों का, उनके घरों का एक अहम् हिस्सा बन गया है। कोरी खाली दीवारों को कला के रंगो से सजाना बेहद खूबसूरत काम है। तो अगली बार अगर आप लखनऊ में अमीनाबाद जायें तो 'तस्वीर वाली गली' जाना न भूलें और अपने लिए एक सुन्दर सा फ्रेम जरूर लें।

नॉक नॉक (Knock Knock)



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