कविताएं हम सब की जीवन में एक ख़ास अहमियत रखतीं हैं क्यूंकि वह एक कवि द्वारा लिखी गयीं वो रचनायें हैं जिसकी मदद से वह अपने दृष्टिकोड को रचनात्मक ढंग से आम जनता तक पंहुचा पाता है और एक अहम् मुद्दे पर एक अलग पहलू से अवगत कराता है । ऐसे ही एक कवि थे रघुवीर सहाय, जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से ‘आत्महत्या’ जैसे एक अहम् मुद्दे पर खुल कर अपनी बात कही और हिंदी लेखन के क्षेत्र में अनेकों काम किये।

अगर आप रघुवीर सहाय की कविताओं पर नज़र डालें तो आप पाएंगे की उनकी लिखाई में ‘हिंदी लेखन’ के साथ-साथ पत्रकारिता की झलक भी है और ऐसा इसलिए है क्यूंकि वह एक तेजस्वी कवि होने के साथ-साथ एक पत्रकार भी थे और बात सिर्फ यहीं तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि वह निबंध लेखक और आलोचक भी थे। रघुवीर सहाय ने अपनी काव्य-शैली में सरल, सहज और सधी हुई भाषा का प्रयोग किया है।

मनुष्य के कल्याण के लिए
पहले उसे इतना भूखा रखो कि वह औऱ कुछ
सोच न पाए
फिर उसे कहो कि तुम्हारी पहली ज़रूरत रोटी है
जिसके लिए वह गुलाम होना भी मंज़ूर करेगा
फिर तो उसे यह बताना रह जाएगा कि
अपनों की गुलामी विदेशियों की गुलामी से बेहतर है

कविता-ग़ुलामी

नवाबों के शहर से रखते थे ताअल्लुक़

बीते वक़्त की तरफ ना मुड़ कर, भविष्य से आशा रखने वाले आशावादी रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर 1929 में नवाबों के शहर लखनऊ में हुआ था। वर्ष 1946 से अपनी रचना की शुरुआत करते हुए उन्होने वर्ष 1951 में लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. कर अपनी शिक्षा पूरी करी थी। अंग्रेज़ी साहित्य से एम.ए. करने के बाद भी उन्होंने अपने हिंदी साहित्य के सृजन को बरकरार रखा और साथ ही पत्रकारिता भी प्रारम्भ कर दी थी।

अपने काम के प्रति जुनून रखने वाले रघुवीर सहाय नौकरी की तलाश में दिल्ली प्रस्थान कर गए और वर्ष 1955 में उनका विवाह विश्लेष्वरी सहाय से हुआ। रघुवीर सहाय ने पत्रकारिता के क्षेत्र में ख़ूब काम किया। वह ‘नवजीवन’ में उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे और वक़्त बीतने के साथ-साथ वह ‘प्रतीक’ के सहायक संपादक, आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक तथा आकाशवाणी में विशेष संवाददाता रहे। उन्होंने ‘नवभारत टाइम्स’, दिल्ली में भी काम किया जहां वह विशेष संवाददाता रहे और ‘दिनमान’ में समाचार संपादक रहे। 1969 से 1982 तक ‘दिनमान’ के प्रधान संपादक भी रहे।

दूसरे सप्तक के थे कवि

रघुवीर सहाय का नाम कवियों की उस श्रृंखला में शामिल है जिनकी सोच और लिखाई दूसरे सप्तक से प्रेरित है। यह वह दौर था जब भारत आज़ादी के बाद अपने आप को संतुलित कर रहा था जिस वजह से पूरे राष्ट्र को पक्षपात, अन्याय और उच्च वर्ग के द्वारा लोगों के शोषण, जैसे अहम् मुद्दों से जूझना पड़ रहा था। इन सारी परिस्थतियों के बीच भी रघुवीर सहाय ने अक्सर साहित्य में अकेलेपन और बेग़ानेपन से परे हटकर आम आदमी की समस्याओं की बात की, स्त्री विमर्श के बारे में भी लिखा और 36 कविताओं के अपने संकलन की पुस्तक ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में आत्महत्या जैसे एक व्यक्तिगत मुद्दे पर अपनी कविताओं के ज़रिये बात करी। वह मानते थे कि अखबार की खबरों के भीतर दबी ऐसी खबरें होती हैं जिनमें मानवीय पीड़ा छिपी रह जाती है। इस छिपी हुई मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति करना ही कविता का दायित्व है।

फिर जाड़ा आया फिर गर्मी आई
फिर आदमियों के पाले से लू से मरने की खबर आई :
न जाड़ा ज़्यादा था न लू ज़्यादा
तब कैसे मरे आदमी
वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते,
मर जाते हैं तब लोग जाड़े और लू की मौत बताते हैं।

कविता ‘ठण्ड से मृत्यु’

रचनाओं को किया गया है सम्मानित

वर्ष 1982 में रघुवीर सहाय को उनकी पुस्तक ‘लोग भूल गए हैं ‘, के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके इलावा ‘आत्महत्या के विरुद्ध’, सीढ़ियों पर धूप, एक समय था, कुछ पते कुछ चिट्ठियां, लोकतन्त्र का संकट आदि लोगों द्वारा ख़ूब पसंद करीं गयीं। एक कवि और पत्रकार होने की वजह से रघुवीर सहाय सरल शब्दों में लोगों तक अपनी बात पहुंचाते थे और अपने जीवन में अनेकों सराहनीय रचनाएं करने के बाद 30 दिसंबर 1990 को रघुवीर सहाय ने दिल्ली में अपनी अंतिम साँस ली थी।

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