बीते वर्षों में बड़ी संख्या में महिलाएं सिविल सेवा परीक्षा पास कर रही हैं और प्रतिष्ठित भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में शामिल हो रही हैं। हालांकि यह आज के समय के लिए बहुत सामान्य बात है, लेकिन पहले स्थिति अलग थी। 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, विशेष रूप से भारत के एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने से पहले, महिलाओं के बीच शिक्षा बहुत दुर्लभ थी, और परिणामस्वरूप प्रशासन में महिलाओं की भागीदारी भी नगण्य थी। लेकिन हम आज जिन साहसी और कर्मठ महिला की कहानी आप तक लेकर आये हैं, वे एक ऐसे समय में जन्मी और बड़ी हुईं जब अधिकतर महिलाएं परदे के भीतर जीवन व्यतीत कर रही थीं। ऐसे समय में लिंग और सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर 'ईशा बसंत जोशी' ने मेहनत और ईमानदारी के दम पर अपने लिए एक विशेष जगह बनायीं। वे आगे बढ़ीं, खूब पढ़ीं और ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की पहली महिला आईएएस अधिकारी बनीं। ईशा जोशी ने अपने अतुलनीय जीवन काल में अपना और अपने देश का नाम रौशन किया और ऐसे किया की दुनिया देखती रह गयी।

31 दिसंबर 1908 को जन्मीं 'ईशा जोशी' एक प्रशासक, लेखक और संपादक थीं। नवाबों के शहर लखनऊ में जन्मीं और पली बढ़ी ईशा जोशी ने ला मार्टिनियर गर्ल्स कॉलेज से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और वास्तव में, वह इस "बास्टियन ऑफ़ ब्रिटिश" में प्रवेश पाने वाली पहली भारतीय लड़की थीं। बाद में, उन्होंने लखनऊ के इसाबेला थोबर्न कॉलेज में अपनी शिक्षा जारी रखी और लखनऊ विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ आर्ट्स पूरा किया। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्हें इलाहाबाद में पुरुषों के सरकारी प्रशिक्षण केंद्र में पहली महिला अध्यापक के रूप में नियुक्त किया गया था।

एक आईएएस के रूप में जीवन


ईशा बसंत जोशी लखनऊ की ज्वाइंट मजिस्ट्रेट और असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर तैनात थीं। अपने करियर के दौरान, उन्होंने भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उप और संयुक्त सचिव के रूप में कार्य किया। उन्होंने वरिष्ठ और सम्मानजनक पदों पर भी कार्य किया और जिला राजपत्र की कमीशनर-सह-राज्य-संपादक बनीं। झांसी पर उनके दवारा किये गए काम का कुछ हिस्सा देखने को मिलता है। वह वर्ष 1966 में अपनी सेवानिवृत्ति तक इस पद पर रहीं। वे कलात्मक महिला थीं, बौद्ध जयंती पार्क, नई दिल्ली की योजना बनाने में उनकी प्रमुख भूमिका थी।

सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन

1966 में अपनी सेवानिवृत्ति के बाद, जोशी ने एक लेखक के रूप में अपने करियर के अगले चरण की शुरुआत की और उनकी किताबें ईशा जोशी के नाम से प्रकाशित हुईं।

स्पिंड्रिफ्ट "Spindrift" नामक उनकी कविताओं का संग्रह वर्ष 1987 में प्रकाशित हुआ था और जर्नल ऑफ कॉमनवेल्थ लिटरेचर, 1995 में इसका उल्लेख है। उनकी पुस्तक द ज्वेल इन द केस "Jewel in the Case" और अन्य कहानियों के साथ-साथ सैंक्चुअरी "Sanctuary" नामक कविता का संग्रह वर्ष 1994 में लेखकों की कार्यशाला कलकत्ता द्वारा प्रकाशित हुआ था।

My heart leaps up when I behold

A rainbow coloured salad and concludes,

Ah then my mouth with pleasure fills,

Champing those golden fries and grills

Some of her haikus are quite telling:

In the glass I see your face, not mine

ईशा जोशी की कविता में जीवन की समकालीन सामाजिक वास्तविकता की गहन समझ थी, भले ही उनका गुस्सा व्यापक नारीवादी धारणा में निहित है। उनकी काव्य संवेदनशीलता चारित्रिक रूप से कोमल, व्यक्तिगत और विडंबनापूर्ण है। उनके जैसा जीवन हमें आगे बढ़ने,अच्छे काम करने और सद्भावना के साथ सेवा करने की प्रेरणा देता है। इतनी स्वर्णिम हस्ती होने के बावजूद भी उनका जीवन भारतीय प्रशासन के पन्नों में गुम हो गया है और भारत की पहली महिला आईसीएस अधिकारी ईशा जोशी के जीवन और व्यक्तित्व पर यह लेख सिर्फ एक छोटी सी कोशिश है की हम यह समझ सकें की एक ऐसा काम, एक ऐसे दुर्लभ समय पर करना जिसे पहले किसी महिला ने न किया हो अपने आप में अदम्य साहस और सहनशीलता का सबब है। एक अतुलनीय शख्सियत और भारत की पहली आईसीएस अफ़सर का जीवन हमे यह याद दिलाता है की हम सबके भीतर एक अटूट साहस है जिसे हमे समय समय पर पहचानना चाहिए और अपने जीवन का मार्ग जैसा हम चाहें वैसा प्रशस्त करना चाहिए।