निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार

जिनकी जिह्वा पर होता है, उनके अंतर का अंगार

नहीं जिन्हें, चुप कर सकती है, आतताइयों की शमशीर

मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़!

कवि - हरिवंश राय बच्चन

इन पंक्तियों को पढ़कर यह समझ आता है की भाग्य और ईश्वर भी उन्ही का साथ देते हैं जिनके भीतर अपने अधिकारों के लिए लड़ने की क्षमता होती है। वैसे तो इस दुनिया में किसी को हक़ नहीं है की किसी व्यक्ति से अपने हिस्से के जीवन को खुलकर जीने की आज़ादी को छीनने का। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण सच यही है की हम समाज के लोगों ने क्वीर (queer) जीवन को सामाजिक मानदंडों के शिकंजे के बीच जकड़ रखा है।

कुछ ऐसे व्यक्ति जो लिंग के मानदंडों की सीमित दुनिया से अलग एक ऐसा जीवन बिताना चाहते हैं जहाँ उन्हें अपने सच्चे व्यक्तित्व को सामने रखने के लिए जद्दोजहद न करनी पड़े। हालांकि आगे की लड़ाई में अभी भी एक लंबी और कठिन यात्रा शामिल है, हम LGBTQIA+ लोगों के मुद्दों को उनके नज़रिये से समझकर एक ऐसा वातावरण बना सकते हैं जहाँ इंसान को इंसान समझा जाए और उन्हें ये विश्वास दिलाया जाए की वे अपने कमज़ोर पलों में भी बेहतर हैं और सबसे मज़बूत हैं।

तो, यहाँ 5 दिल को छू लेने वाली शार्ट फिल्मों का ज़िक्र हैं जो लखनऊ और उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों के क्वीर (queer) व्यक्तियों की दास्ताँ बयां करती हैं, जो आपके दिल और दिमाग में अपना एक अंश अवश्य छोड़कर जाएंगी!

मुझे वैसे ही अपनाएं जैसा मैं हूं!

सब कहते हैं की खुलकर अपने व्यक्तित्व को बाहर लेकर आना अपनी मर्ज़ी है, लेकिन धूप के नीचे खिलते हुए खूबसूरत जीवन का जश्न भला कौन नहीं मनाना चाहता। 'तंज़ील' की कहानी इन पंक्तियों पर लिखी हुई एक मार्मिक दास्तान है जो अपने माता-पिता, दोस्तों, परिवार और समाज के साथ अपने क्वीर व्यक्तित्व को सांझा करने की एक अनोखी यात्रा है। इस फिल्म में साहस के अलावा, मुख्य किरदार के द्वारा दिए गए संदेश की सादगी आपके दिल पर एक अमिट छाप छोड़ेगी!

तुम जैसे हो, बहुत प्यारे हो, मेरे बच्चे!

हम अक्सर यह पहचान नहीं पाते हैं कि कुछ लोगों के जीवन अपने अंदर के संघर्षों और जटिलताओं के जाल में फंस जाते हैं। ऐसे में माता-पिता का समर्थन आवश्यक बन जाता है, लेकिन इसे प्राप्त करना उतना आसान नहीं है। इसके विपरीत, 'जतिन' एक युवा ट्रांसजेंडर व्यक्ति की कहानी है, जिसे अपनी मां की बाहों में प्यार और स्वीकृति मिलती है। वर्षों तक उसके अंदर होने वाली उथल-पुथल के बाद, जब बच्चे के सच्चे व्यक्तित्व का स्वागत किया जाता है, तो उसके जीवन की चमक फिर से जीवित हो जाती है!

अपने जीवन की कहानी फिर से लिखें

क्वीर (Queer) लोगों को अक्सर यह विश्वास दिलाया जाता है कि उनकी परेशानी उनके अपने कार्यों का परिणाम है और धर्म इसके लिए एक महत्वपूर्ण साधन बन जाता है। धर्म के मूल सिद्धांतों की फिर से व्याख्या करके आत्म-स्वीकृति का एक मार्ग प्रशस्त करते हुए, जैरी एक 21 वर्षीय व्यक्ति की कहानी दर्शाता है, जो एक क्वीर व्यक्ति के रूप में अपना जीवन शुरू करता है। एक सामाजिक अपील के साथ व्यक्तिगत आकांक्षाओं को साथ मिलाते हुए, यह कहानी किसी को अपने सच्चे व्यक्तित्व को अपनाने के लिए प्रेरित कर सकती है!

परिवार से दूर एक 'परिवार' ढूंढ़ना!

जबकि हम सभी अपने परिवारों द्वारा प्यार से स्वीकार किए जाने के लिए तरसते हैं लेकिन वास्तविकता कभी-कभी हमारे सपनों की सच्चाई से काफी अलग होती है। इसके बावजूद, हम सभी अपनी सरल इच्छाओं को जीने के लिए एक परिवार चुन सकते हैं और 'जितेंद्र' की कहानी इस बात की गवाही देती है। अपने दोस्तों और साथियों के बीच अपने अंदर की सच्ची अभिव्यक्ति को उजागर करते हुए, यह शार्ट फिल्म घर के बाहर आत्मविश्वास खोजने की अनोखी यात्रा है!

एक बहन से मिला सांत्वना भरा साथ!

जब आप लंबे समय तक एक रहस्य के साथ रहते हैं, तो एक ऐसा साथी ढूंढना आसान नहीं होता है जिसके साथ आप अपने अंतर का कुछ बाँट सकें। लेकिन ऐसे समय के दौरान, अपनी सहजता पर भरोसा करना और आगे बढ़ना महत्वपूर्ण है, जैसे इस फिल्म में अली के किरदार ने किया था। यह शार्ट फिल्म आपको किसी भरोसेमंद का सहयोग लेने और डर की बेड़ियों को तोड़ने के लिए प्रेरित करेगी, भले ही आपका रहस्य कुछ भी हो। सच है की अपनेपन से भरा एक स्पर्श आपके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर व्यापक ख्याति प्राप्त की है!


संवेदनशील मुद्दों और चलती-फिरती जीवन-यात्राओं को जोड़ते हुए, इन शार्ट फिल्मों ने दुनिया भर में ख्याति और पहचान हासिल की है। सर्वोत्तम कहानियों के साथ इनमें से कुछ को एम्स्टर्डम (Amsterdam) में 22 वें अंतर्राष्ट्रीय एड्स सम्मेलन (22nd International AIDS conference in Amsterdam) में दिखाया गया था और कई पुरस्कार भी जीते थे।

विशेष रूप से, इनमें से अधिकांश शार्ट फिल्मों का निर्देशन एलजीबीटीक्यूआईए (LGBTQIA+) कार्यकर्ता 'यादवेंद्र सिंह दरवेश' (Yadavendra Darvesh Singh) ने किया है और वे लखनऊ के अवध क्वीर प्राइड वॉक (Awadh Queer Pride वाक) के अग्रणी हैं। द हमसफ़र ट्रस्ट, मुंबई और मल्टी-कंट्री साउथ एशिया एचआईवी प्रोग्राम के समर्थन से शूट की गयीं, ये शार्ट फिल्में निश्चित रूप से इस समुदाय के बारे में आपका दृष्टिकोण बदल सकते हैं।

आशावादी और उत्साहजनक, ये सभी शार्ट फिल्में स्वाभाविक रूप से एक ऐसे दिन का सपना देखती हैं जब 'क्वीर' होना अब टैबू नहीं होगा! जबकि कुछ लोग इस मुद्दे पर सहानुभूति जता सकते हैं, जो वास्तव में इस अंतर को कम करेगा वह है सहानुभूति और सद्भाव का नजरिया। इसलिए, यदि हम वास्तव में परिवर्तन करना चाहते हैं, तो हमें मानव अस्तित्व की अनेक रंगो और विविधता की सराहना करनी चाहिए तभी हम सभी के लिए समान रूप से बढ़ने और समृद्ध होने के लिए पर्याप्त जगह होगी!