भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम में मंगल पांडेय और रानी लक्ष्मी बाई जैसे कई वीर और वीरांगनाओं की वीरता की कहानियां हम लोग हमेशा इतिहास की किताबों में पढ़ते आये हैं लेकिन कुछ योद्धा ऐसे थे जिनका ज़िक्र किताबों में आने से रह गया लेकिन मातृभूमि के लिए उनका त्याग और बलिदान अमिट है।

वे दूरस्थ गांवों के निम्न समुदायों से थे लेकिन फिर भी अंग्रेजी बेड़ियों से भारत को आज़ाद कराने का सपना उनके भीतर भी धधकता था। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा किये गए अन्याय और अत्याचारों के खिलाफ जंग में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कौन थे ये सामान्य पुरुष और महिलाएं ? जिनके भीतर असामन्य अदम्य साहस था और जिन्होंने दृढ़ निश्चय किया के वे अपनी भूमि का गौरव सुरक्षित करके रहेंगे।

ऐसी ही एक असाधारण योद्धा की कहानी हम आपके लिए लाएं हैं जिनका नाम था 'उदा देवी' - एक बहादुर सेनानी, जिन्होंने 1857 के स्वंतंत्रता संग्राम में 'जनरल कॉलिन कैंपबेल' के मार्गदर्शन में लखनऊ पर घेराबंदी करने वाले ब्रिटिश सेना के दो दर्जन से अधिक सैनिकों को मार गिराया। जिस उम्र में महिलाओं को घर परिवार की छाया में रहने की उम्मीद की जाती थी उस उम्र में उदा देवी ने युद्ध के मैदान में पदभार संभाला और अवध के लिए लड़ते हुए अपनी जान दे दी।

ब्रिटिश शासन के खिलाफ 1857 के भारतीय विद्रोह ने देश भर में लड़ी गई कुछ सबसे रक्तरंजित लड़ाइयों को देखा। जबकि विद्रोह सफल नहीं हुआ लेकिन फिर भी 1857 के विद्रोह ने ही आगामी आज़ादी की लड़ाई की ज़मीन तैयार की और सभी साहसी स्वंतंत्रता सेनानियों में से उदा देवी का नाम लखनऊ में अंग्रेज़ों के खिलाफ एक भयंकर युद्ध का नेतृत्व करने के लिए विशिष्ट रूप से उभर कर सामने आता है।

32 ब्रिटिश सैनिकों को मार गिराया।



उदा देवी पासी अवध के एक छोटे से गांव में पैदा हुई थीं और किसी भी अन्य भावुक भारतीय की तरह, ब्रिटिश साम्राज्य के अत्याचारों को देखकर उनका खून भी उबल रहा था। वह बेगम हजरत महल की आज़ादी की लड़ाई के प्रयासों में शामिल हो गईं और लखनऊ की घेराबंदी के दौरान उन्हें बेगम द्वारा महिला बटालियन की कमान सौंपी गई।

1857 के नवंबर में, जनरल कॉलिन कैंपबेल भारतीय सुरक्षा रेखाओं को पार करके फंसे हुए गैरीसन चर्च को बचाने में कामयाब रहे। इसके बाद कैंपबेल की 93वीं हाइलैंड रेजीमेंट गोमती के दक्षिणी किनारे पर सिकंदर बाग के महल की ओर बढ़ी।

यहां, विद्रोहियों ने अपनी स्थिति को सुरक्षित करने के लिए वीरतापूर्ण लड़ाई लड़ी। एक भीषण युद्ध के बाद 2000 से अधिक विद्रोहियों और सैनिकों की मौत हो गई। इसी लड़ाई के दौरान उदा देवी के पति को मार डाला गया था। और इसके बाद बहादुर सैनिक उदा देवी ने उग्र रूप धारण किया और पति की मौत का बदला लेने का फैसला किया। सिकंदर बाग के पास जब उन्होंने ब्रिटिश सेना को आते हुए देखा तब वे एक बरगद के पेड़ पर चढ़ गयीं, एक आदमी का भेस धारण कर उन्होंने 32 ब्रिटिश सैनिकों को मार डाला।

जनरल कैंपबेल के नेतृत्व वाली सेना की रेजिमेंट ने जब सिकंदर बाग को तबाह कर दिया तब यह देखा गया कि कई ब्रिटिश सैनिकों के गोली के घावों की वक्र रेखा खड़ी और नीचे की ओर थी और यह एक विशेष संकेत था। इस संदेह में कि पास के पेड़ में एक निशानेबाज़ अभी भी छिपा हुआ था, अंग्रेजों ने खुलेआम गोलीबारी की और तब ही एक विद्रोही का शरीर जमीन पर गिर गया। जांच करने पर पता चला कि यह विद्रोही उदा देवी थी - एक महिला जिसे आजादी के लिए इस संघर्ष में भाग लेने के लिए एक पुरुष के रूप में तैयार किया गया था। जब उन्होंने यह महसूस किया कि सिपाही एक महिला है तब अंग्रेज हैरान रह गए। ऐसा कहा जाता है कि कैंपबेल जैसे ब्रिटिश अधिकारियों ने भी उनकी बहादुरी को देखते हुए उनके शव पर अपना सिर झुकाया था।

समकालीन प्रासंगिकता



उदा देवी वास्तव में एक प्रेरणा हैं, खासकर गैर-प्रमुख जातियों की महिलाओं के लिए। निस्संदेह, प्रत्येक वर्ष 16 नवंबर को, उनकी पासी जाति के सदस्य उनके पतन के स्थल पर इकट्ठा होते हैं और उन्हें एक बहादुर विद्रोही के रूप में याद करते हैं, एक ऐसी विद्रोही जिसने ब्रिटिश साम्राज्य से अपनी भूमि को आज़ाद करने के लिए हर सामाजिक लकीर को पार किया।

यदि आप कभी सिकंदर बाग के बाहर चौराहे से गुजरे हैं, तो आपने देखा होगा कि एक राइफल लिए एक मूर्ती है इसी मूर्ती के माध्यम से ये शहर वर्षों से उदा देवी के बलिदानों को श्रद्धांजलि प्रदान कर रहा है जिन्होंने लगभग 32 ब्रिटिश सैनिकों को मारते हुए भारतीय इतिहास में अपना नाम साम्राज्यवाद-विरोधी विद्रोही के रूप में दर्ज किया और जिनके हाथ से चली हर गोली ने महिलाओं के लिए बनी रूढ़ियों को ललकारा।

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