लखनऊ है तो महज़ गुम्बद-ओ-मीनार नहीं,

सिर्फ एक शहर नहीं कूचा-ओ-बाजार नहीं,

इसके आँचल में मोहब्बत के फूल खिलते हैं,

इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं।

- योगेश प्रवीन

आज लखनऊ अकेला है, उदास है क्यूंकि उसका एक होनहार बेटा उससे बिछड़ गया है। जी लखनऊ के बेटे योगेश प्रवीन हमेशा हमेशा के लिए अपने घर लखनऊ को छोड़कर चले गए हैं। 28 अक्टूबर 1938 में लखनऊ के सर ज़मीन पर जन्मे योगेश जी ने सोमवार को 81 वर्ष की उम्र में अपने इस शहर से विदा ले ली। वे कहते थे की इस शहर की गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं और इसके आंचल में मोहब्बत के फूल खिलते हैं इस प्रकार का प्रेम उनका इस शहर के प्रति था की वे लखनऊ में जीते थे और लखनऊ उनमें।

पद्मश्री डॉ योगेश प्रवीन जी की नस - नस में लखनऊ शहर की आबो हवा इस कदर समायी थी की उन्हें लखनऊ का 'इन्सैक्लोपेडिया' कहा जाता है। लोगों को यदि लखनऊ के इतिहास के बारे में कुछ जानना होता यहां के गली-कूचों के बारे में जानना हो या लखनऊ की शायरी या लखनऊ के नवाबों या बेगमातों का हाल जानना हो, ऐतिहासिक इमारतों, लडा़इयों या कि कुछ और भी जानना हो योगेश प्रवीन जी सब कुछ विस्तार से और पूरी विनम्रता से बताते थे। बहुत विनम्रता और धैर्य के साथ, योगेश जी ने कभी भी किसी व्यक्ति को अपने ज्ञान की कमी के लिए छोटा महसूस नहीं कराया वे सरल प्रश्नों का भी विस्तार से उत्तर देते थे। लखनऊ के प्रति उनका अपार प्रेम और प्रकर्ति के द्वारा दी गयी सादगी सचमुच अनुकरणीय थी।

उनके लिखे हर शब्द में है लखनऊ की खुशबू !



इतिहासकार योगेश प्रवीन ने न सिर्फ़ लखनऊ के बसने का इतिहास लिखा है बल्कि लखनऊ के सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व का भी खूब बखान किया है। कई-कई किताबों में, दास्ताने अवध, ताजेदार अवध, गुलिस्ताने अवध, लखनऊ मान्युमेंट्स, लक्ष्मणपुर की आत्मकथा, हिस्ट्री आफ़ लखनऊ कैंट, पत्थर के स्वप्न, अंक विलास आदि किताबों में उन्होंने अलग-अलग विषय बना कर अवध के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। जब कि लखनऊनामा, दास्ताने लखनऊ, लखनऊ के मोहल्ले और उन की शान जैसी किताबों में लखनऊ शहर के बारे में विस्तार से बताया है। एक से एक बारीक जानकारियों के साथ ऐसा लगता है कि जैसे योगेश प्रवीन को ईश्वर और प्रकृति ने लखनऊ का इतिहास लिखने ही के लिए दुनिया में भेजा था।

यह अनायास नहीं है कि जब कोई फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने लखनऊ आता था तो वह पहले योगेश प्रवीन को ढूंढता था और फिर शूटिंग शुरु करता था। वह चाहे शतरंज के खिलाड़ी बनाने आए 'सत्यजीत रे' हों या जुनून बनाने आए 'श्याम बेनेगल' हों या फिर उमराव जान बनाने वाले 'मुजफ़्फ़र अली' या और तमाम फ़िल्मकार। एक बार एक शख्स ने उनसे पूछा कि आखिर अवध और लखनऊ के बारे में लिखने के लिए उन्हें सूझा कैसे ? कि वह इसी के हो कर रह गए ? तो वह जैसे फिर से लखनऊ में डूब से गए, कहने लगे कि छोटी सी छोटी चीज़ को भी बड़ी औकात का दर्जा देना लखनऊ का मिजाज है, इसी लिए।

जीवन भर लखनऊ को गौरवान्वित किया



लखनऊ के लिए उनका प्रेम देश भर में लोकप्रिय था उन्होंने साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में भरपूर काम किया जिसके लिए उन्हें 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। योगेश प्रवीन जी को अपने जीवनकाल में कई पुरुस्कारों से नवाज़ा गया जैसे लखनऊ नामा के लिए राष्ट्रिय पुरूस्कार प्राप्त हुआ यू.पी. रत्न पुरस्कार (2000), राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार (1999), यश भारती पुरस्कार (2006), और यू.पी. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1998)।

अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर ये कहा जाए कि मुहब्बत और इंसानियत का कोई चेहरा होता तो हूबहू योगेश जी जैसा दिखता। उनके जैसा ममतामई व्यक्तित्व मिलना दुर्लभ है। वे एक प्रख्यात लेखक, एक कल्पनाशील व्यक्ति, शिक्षक, एक संवेदनशील कवि, एक कुशल निबंधकार और एक जीवंत रचनाकार थे। वे 81 साल लखनऊ को समर्पित रहे और अभी भी किताबें पढ़ने और कविताएँ लिखने में व्यस्त रहते थे। योगेश प्रवीन जी अपनी मां स्वर्गीय श्रीमती रामा श्रीवास्तव से प्रेरित थे, जो अपने समय की प्रख्यात कवयित्री थीं। लखनऊ के उनके शिष्य रह चुके प्रसिद्द दास्तानगो हिमांशु बाजपाई कहते हैं की, ''लखनऊ बेहद ख़ुश्किमत है की उसके पास योगेश प्रवीन जैसा बेटा था काश की हर शहर को उसका योगेश प्रवीन मिले। इतने वर्षों तक लखनऊ की आभा को अपने अंदर सुरक्षित रखकर जीते आये और लखनऊ का नाम मुख पर आते ही जिनकी आंखों में चमक आ जाती थी उन गौरवशाली और तेजस्वी योगेश प्रवीन जी को पूरे लखनऊ का शत शत नमन''।

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