किसी भी प्रकार की लैंगिक एवं सामाजिक असमानता की ज़ंजीरों की खिलाफत करने वाले लखनऊ के सलीम किदवई आज सभी रुकावटों से हमेशा के लिए आज़ाद हो गए। सलीम किदवई जी की पैदाइश लखनऊ में 1950 में हुई थी और उन्होंने दुनिया से विदा भी अपने ही शहर से ली। एक लेखक,अनुवादक और समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ता के रूप में प्रसिद्ध सलीम किदवई आज़ाद ख्यालों के धनी थे जी अपनी पूरी उम्र सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली मज़बूत आवाज़ बने रहे।

दिल्ली विश्वविद्यालय में मध्यकालीन इतिहास पढ़ाने वाले 70 वर्षीय, LGBTQIA+ समुदाय के सदस्य के रूप में समलैंगिक अधिकारों पर सार्वजनिक रूप से बोलने वाले भारत के पहले शिक्षाविदों में से एक थे। अपनी रोज़मर्रा के जीवन में लैंगिक असामनता की रूढ़ि वादिता से परेशान अनेक व्यक्तियों की वे प्रेरणा बने और उनके मन में सहस का दीपक जलाया।

किदवई जी ने मोंटाना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर “रूथ वनिता” के साथ सह-लेखन में सेम-सेक्स लव इन इंडिया: रीडिंग्स फ्रॉम लिटरेचर एंड हिस्ट्री (2001) की रचना की। इसके अलावा सलीम किदवई ने गायिका मलिका पुखराज की आत्मकथा “सॉन्ग सुंग ट्रू” (‘Song Sung True’) का भी अनुवाद किया है। उन्होंने प्रसिद्ध उर्दू लेखक कुर्रतुल ऐन हैदर के उपन्यासों का भी अनुवाद किया। उनका निधन साहित्य जगत के लिए एक दुर्भाग्य है। वे अपने पीछे बेहद समृद्ध एवं अद्वितीय साहित्यिक विरासत छोड़ गए हैं।

उनके निधन पर साहित्य जगत एवं सामजिक समुदायों के जाने माने लोगों ने गहन शोक व्यक्त किया। वरिष्ठ लेखिका राना सफ्वी अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा- अभी-अभी लखनऊ से कौन-सी भयानक खबर आ रही है? सलीम किदवई भाई इस दुनिया में नहीं रहे. वह आज सुबह हमें छोड़कर चले गए. एक प्रसिद्ध इतिहासकार, लेखक और समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ता, सलीम अपने पीछे साहित्य और दोस्ती की एक समृद्ध और मूल्यवान विरासत छोड़ गए हैं।

सलीम किदवई जी बेशक आज हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनके दिल की आवाज़ और उनके आज़ाद ख्याल सदियों तक युवाओं और उस हर व्यक्ति के मन में प्रतिध्वनित होंगे जो अपनी वास्तविकता को खुलकर जीना चाहते हैं। 

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