लखनऊ में आजादी की लड़ाई सिर्फ पुरुषों ने ही नहीं लड़ी। महिलाओं ने भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हुई जंग में न सिर्फ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया बल्कि कई मोर्चों पर इसकी अगुवाई भी की।

इनके साझा प्रयासों से देश को 1947 में अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिल गई, लेकिन यह लम्हा सिर्फ एक दिन की कोशिश में ही नसीब नहीं हुआ। इसके लिए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने 1857 से ही क्रांति की अलख जगा रखी थी।

बेगम हजरत महल ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था

लखनऊ के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने निवर्सित करके कलकत्ता भेज दिया गया तो उनकी पत्नी बेगम हजरत महल ने अपने बेटे बिरजिस कदर को गद्दी पर बिठाकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग का ऐलान किया। अपने कुशल नेतृत्व के दम पर बेगम ने अंग्रेजी शासन की नींव हिलाकर रख दी, लेकिन अपनों की गद्दारी के चलते उनको यहां से पलायन करना पड़ा और नेपाल में शरण लेनी पड़ी। नेपाल में ही 7 अप्रैल 1879 को उनकी मौत हो गई। उनकी याद में बाग बाजार में वहां एक मजार भी बनाई गई। आजादी के बाद भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू 1962 में नेपाल गए तो उन्होंने अपने कैमरे से मजार की तस्वीर ली और बेगम के वंशजों को भेजी।

बादशाह बेगम ने नहीं मानी थी अंग्रेजों की बात

अवध के नवाब बादशाह गाज़ीउद्दीन हैदर की मौत के बाद उनकी पत्नी बादशाह बेगम ने पहले स्वतंत्रता संग्राम से 20 साल पहले ही अंग्रेजी सरकार की नाफरमानी शुरू कर दी थी। यहां तक कि उन्होंने अंग्रेजों की मर्जी के खिलाफ जाकर अपने पोते अवध को नवाब घोषित कर दिया। हालांकि इसके बाद उनको और उनके पोते दोनों को अंग्रेजों ने कैद कर लिया। 

वीरांगना ‘ऊदा देवी’ के सम्मान में अंग्रेजों ने अपने सिर झुका लिए थे 

बेगम हजरत महल ने पुरुषों के साथ ही महिलाओं को भी जंग के लिए तैयार किया था। 16 नवंबर 1857 को ऐसी ही एक वीरांगना की वीरता का गवाह सिकंदर बाग बना था। भवन में स्थित पीपल के पेड़ पर चढ़कर वीरांगना ‘ऊदा देवी’ ने एक दो नहीं बल्कि 30 से ज्यादा अंग्रेजों को अपनी गोली का निशाना बनाया था। अंग्रेजों की गोली से शहीद होने के बाद जब अंग्रेजों ने देखा कि हमला करने वाला पुरुष नहीं बल्कि एक महिला है तो उनके सिर भी ऊदा देवी के सम्मान में श्रद्धा से झुक गए। ऊदा देवी के पति ‘मक्का पासी’ बेगम की सेना में थे तथा चिनहट में हुई लड़ाई में शहीद हो गए थे। ऐसे समय में पति की मौत का गम मनाने के बजाय ऊदा देवी ने अंग्रेजों से देश की आजादी के लिए लड़ने का फैसला किया था। 

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