रात नहीं ख्वाब बदलता है,

मंजिल नहीं कारवाँ बदलता है;

जज्बा रखो जीतने का क्यूंकि,

किस्मत बदले न बदले ,

पर वक्त जरुर बदलता है 

कहते हैं कि अगर आपके अंदर प्रतिभा और मेहनत करने का जज़्बा है तो, आपको आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती है, मेहनत अपना रंग दिखाती ही है। मन में कुछ करने का जज़्बा हो तो विपरीत परिस्थितियों में भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। ऐसा ही एक उदाहरण लखनऊ के थिएटर बाल कलाकारों ने प्रस्तुत किया और अपने अभिनय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने साथ पूरे लखनऊ का नाम रौशन किया है। चबूतरा थिएटर के 6 बच्चों ने आशीष पंत की फिल्म Uljhan (The Knot) में काम कर इंडियन फिल्म फेस्टिवल लॉस एंजिल्स (IFFLA) से लेकर शंघाई फिल्म महोत्सव (Shanghai Film Festival) तक अपने अभिनय का परचम लहराया है। 

लखनऊ के निर्देशक एवं लेखक आशीष पंत की फिल्म ‘उलझन (द नॉट)’  शंघाई फिल्म फेस्टिवल के बाद तमाम फिल्म महोत्सवों में धमाल मचा रही है। गर्व की बात है कि इस फिल्म में चबूतरा थियेटर पाठशाला की खुशी गौतम के साथ मोहम्मद अमन, शिवानी चौधरी, मोहम्मद सैफ, मोहम्मद आरिफ, मोनू गौतम और हर्ष गौतम ने अभिनय किया है। इस फिल्म के सभी डायलॉग अवधि में हैं। फिल्म में लखनऊ के साथ यूपी को प्रमुखता दी गई है। करीब 2 घंटे की इस फिल्म में ख़ुशी की भूमिका सबसे अहम है। अन्य कलाकारों की छोटी सी भूमिका भी इनका हौसला और परिवार का सम्मान बढ़ाने वाली बात है।

फिल्म की कहानी, मुन्नी का किरदार निभाने वाली 11 वर्षीय ख़ुशी की असल जिंदगी से मिलती-जुलती है। वह सरकारी स्कूल में क्लास 8 की छात्रा है। पिता दुर्घटना में घायल जो गए, फिर उन्हें लकवा मार गया। खुशी बताती है की मम्मी एक अस्पताल में काम करतीं हैं और उसके तीन भाई बहन है। फिल्म में भी उसके रिक्शा चालक पिता का एक्सीडेंट हो जाता है, पिता को खोकर मुन्नी की आवाज चली जाती है। फिर उसे पालने के लिए चाचा दुर्घटना के लिए जिम्मेदार लोगों से पैसे मांगते हैं। वह दोनों किरदार मुन्नी की जिम्मेदारी ले लेते हैं। ख़ुशी कहती है की सर (महेश देवा) ने बताया कि हमने जिस फिल्म में काम किया है, वह विदेश में दिखाई गई है हमें बहुत अच्छा लग रहा है और अभी बहुत काम करना है।

चबूतरा थिएटर के महेश देवा बताते हैं कि आर्थिक तंगी से लड़ते हुए ये बच्चे आगे बढ़ रहे हैं। फिल्म के लिए ऑडिशन हुआ और हमारे थिएटर के 6 बच्चों को इसमें मौका मिल गया है। ये सभी बच्चे 2014 से थिएटर से जुड़े हैं। इनमें से अमन तो निर्देशन में भी माहिर हो गया है, वह लिखता भी अच्छा है। थिएटर में 4 से 18 साल तक के युवा है। 18 वर्ष वाले उस वक्त हमसे जुड़े थे जब वे 9 या 10 साल के थे। ये सभी बच्चे लगातार विज्ञापन, फिल्मों और नाटकों में छाप छोड़ते आ रहे हैं।

फिल्म की कहानी

नवोदित निर्देशक आशीष पंत निर्देशित फिल्म ‘उलझन द नॉट’ की कहानी एक विवाहित जोड़े, सलोनी बत्रा (सोनी) तथा विकास कुमार (हामिद) के इर्द गिर्द घूमती है। गीता और शिरीष से एक दुर्घटना हो जाती है। इस दुर्घटना के बाद उनके जीवन में भूचाल आ जाता है और दोनों किस तरह अपने जीवन में घटित होने वाले व्यावहारिक और भावनात्मक प्रभावों से निपटते हैं, उसी की दास्तान है यह फिल्म। 

मूल रूप से लखनऊ निवासी आशीष पंत वर्तमान समय में न्यूयॉर्क में अभिनय की शिक्षा दे रहे हैं। निर्देशक आशीष पंत ने अपनी फिल्म ”उलझन द नाॅट” के बारे में कहा -“एनएफडीसी द्वारा साउथ एशियन फिल्म्स के लिए सबसे बड़े को-प्रोडक्शन मार्केट फिल्म बाजार में आवेदन करने के बाद मेरी पहली फिल्म ‘उलझन दनॉट’ की यात्रा की शुरूआत हुई। ‘उलझन दनॉट’ की पटकथा को-प्रोडक्शन मार्केट के लिए चुनी गई 18 परियोजनाओं में से एक थी। वहीं पर मेरी मुलाकात कार्तिकेय नारायण सिंह से हुई। मैंउ उनकी फिल्मों का हमेशा से प्रशंसक रहा हूँ। मेरे विशेष आग्रह पर ही उन्होंने पटकथा पढ़ने के लिए अपनी सहमति व्यक्त की और मेरा ‘उलझन द नॉट’ का सपना साकार हुआ।

जानें चबूतरा थिएटर के बारे में 

“चबूतरा थियेटर पाठशाला” को महेश चन्द्र देवा पिछले कई वर्षों से संचालित कर रहे हैं। इस पाठशाला में उन बच्चों की प्रतिभा को निखारा जाता है, जो निर्धनता के चलते खुद में छुपी प्रतिभा को दबाये रहते हैं। महेश चन्द्र देवा बताते हैं, “लगभग पिछले 13 वर्षों से मैं एक संस्था संचालित कर रहा हूं जिसका नाम है मदर सेवा संस्थान, इसी के तहत मैंने चबूतरा थियेटर पाठशाला की शुरुआत की। इस पाठशाला में उन बच्चों को अभिनय, नृत्य, गायन, लेखन, फाइन आर्ट जैसी अन्य कलाओं को सिखाया जाता है जिसकी प्रतिभा उनमें छुपी है, लेकिन पैसे की तंगी के चलते उस प्रतिभा को निखार नहीं पा रहे थे। इन बच्चों के अंदर छुपी प्रतिभा निखर न पाने के चलते इनके सपने भी दम तोड़ रहे थे, जो वह इस क्षेत्र में खुद के लिए देख रहे थे। अब इनकी प्रतिभा भी निखर रही है।”

चबूतरा थियेटर पाठशाला की तीन शाखाएं संचालित हो रही हैं। इन शाखाओं में 4 से 16 वर्ष तक के लगभग डेढ़ सौ बच्चे अभिनय, नृत्य, गायन, लेखन, फाइन आर्ट, मार्शल आर्ट जैसी कलाओं को सीख रहे हैं। सप्ताह में दो दिन लगभग दो से तीन घंटे के लिए अलग-अलग कलाओं की कक्षाएं संचालित होती हैं। इसके साथ ही छुट्टी के दिन व रंगमंच और हिन्दी दिवस जैसे अन्य दिवसों में इन कक्षाओं में अलग-अलग कला से दक्ष शिक्षक बच्चों को प्रशिक्षित कर रहे हैं।

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