मुख्य बिंदु

उत्तर प्रदेश में पहली बार स्वैप किडनी ट्रांसप्लांट किया गया है।

पीजीआइ प्रदेश का पहला संस्थान बना जिसने स्वैप (अदला-बदली) किडनी ट्रांसप्लांट किया।

दोनों मरीजों की सर्जरी एक ही समय एक साथ की गई।

महिला ने महिला को और पुरुष ने पुरुष को किडनी डोनेट की।

किडनी स्वैपिंग से मरीजों का खर्च बच गया और खतरा भी कम होगा। 

लखनऊ पीजीआई में पहली बार स्वैपिंग के जरिए दो मरीजों का किडनी ट्रांसप्लांट किया गया है। दरहसल दोनों मरीजों और उनके डोनर की किडनी मैच नहीं हो रही थी। ऐसे में डोनरों की किडनी की अदला-बदला कर दोनों मरीजों को ट्रांसप्लांट किया गया। दोनों सर्जरी एक ही समय पर साथ की गई। ऑर्गन ट्रांसप्लांट एक्ट के तहत यह सर्जरी की जा सकती है। डॉक्टरों का दावा है कि प्रदेश के किसी भी संस्थान में पहली बार ऐसी सर्जरी हुई है। 

पीजीआई के नेफ्रोलॉजी के हेड डॉ. नारायण प्रसाद ने बताया कि आजमगढ़ निवासी 53 वर्षीय महिला को साल 2018 से किडनी की गंभीर बीमारी थी। पीजीआई में आने पर किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी गई थी। महिला को उनके पति किडनी डोनेट करना चाहते थे, लेकिन दोनों की किडनी मैच नहीं हो सकी। ऐसे में महिला का ट्रांसप्लांट नहीं हो सका और वह डायलिसिस पर चल रही थी। इसी तरह लखनऊ निवासी 54 वर्षीय पुरुष साल 2019 से किडनी की बीमारी से ग्रसित थे। उन्हें उनकी पत्नी किडनी डोनेट करना चाहती थी, लेकिन किडनी मैच नहीं हो रही थी। इन हालात में पहले मरीज के पति की किडनी दूसरे मरीज को ट्रांसप्लांट की गई, तो दूसरे मरीज की पत्नी की किडनी पहले मरीज के शरीर में ट्रांसप्लांट की गई। 

ऑपरेशन थिएटर के बाहर लगाए गए नोटिस बोर्ड

ट्रांसप्लांट हेड डॉ. अनीश श्रीवास्तव ने बताया कि दोनों मरीजों की सर्जरी 31 अगस्त को एक ही समय में अलग-अलग ऑपरेशन थिएटर में की गई। इसके लिए दो टीमें बनाई गई। पहली बार ऐसी सर्जरी थी, ऐसे में गलती न हो इसके लिए ऑपरेशन थिएटर के बाहर नोटिस बोर्ड लगाए गए, ताकि स्टाफ को पता रहे कि किस मरीज को कौन से किडनी लगनी है। ट्रांसप्लांट हेड डॉ. अनीश श्रीवास्तव ने बताया कि किडनी मैच न होने ट्रांसप्लांट किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए डिसेन्सिटाइज़ की प्रक्रिया होती है। इसमें 15 दिन पहले भर्ती होना पड़ता है और करीब 7 लाख का अतिरिक्त खर्च आता है और खतरा भी ज्यादा होता है। किडनी स्वैपिंग से मरीजों का खर्च बच गया और खतरा भी कम होगा। 

किडनी ट्रांसप्लांट के लिए है 1 साल की वेटिंग

डोनर और मरीज का क्रॉस सेल मैचिंग टेस्ट होता है। डॉ. नारायण प्रसाद के मुताबिक, इस टेस्ट में यह देखा जाता है कि डोनर की किडनी मरीज को बॉडी स्वीकार करेगी या नहीं। आपको बता दें कि किडनी ट्रांसप्लांट के लिए पीजीआई में 9 से 12 महीने तो लोहिया में करीब एक साल की वेटिंग है। वहीं, केजीएमयू में अभी ट्रांसप्लांट नहीं हो रहा। 

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