आज 15 अगस्त के दिन देश अपना 75वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। ये दिन देश के उन वीरों की गौरव गाथा और बलिदान का प्रतीक है, जिन्होंने अंग्रेजों के दमन से देश को आजाद कराने में अपने प्राण की आहुति दे दी। सबकुछ न्योछावर कर दिया था। 15 अगस्त 1947 को हमें ब्रिटिश शासन के 200 सालों के राज से आजादी मिली थी। ये दिन हमारे स्वतंत्रता सेनानी (Freedom Fighters) के त्याग और तपस्या की याद दिलाता है। इतिहास के पन्नों में देश की आजादी की लड़ाई में लखनऊ का सबसे अहम योगदान रहा है। लखनऊ के सबसे महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक स्‍थलों में से एक है, रेजीडेंसी भी अंग्रेज़ों से भारत की आज़ादी की लड़ाई का गवाह है। रेजीडेंसी की टूटी – फूटी दीवारों में आज भी तोप के गोलों के निशान बने हुए हैं।

रेजीडेंसी का निर्माण नवाब असिफुद्दौला ने करवाया था। इसे बनाने की शुरुआत 1780 में हुई थी और 1800 में यह तैयार हुआ। 1857 में अंग्रेज़ों ने इस पर कब्जा कर लिया और यहां निवास बनाया इसलिए इसका नाम रेजीडेंसी पड़ गया। यहां एक कब्रगाह है जिसमें गदर के दौरान मारे गए लोगों को दफनाया गया है।

स्वतंत्रता संग्राम में रेजीडेंसी का अपना ही महत्व है। बेगम हजरत महल के प्रमुख सहायक राजा जियालाल के कमांड में लड़ी गई चिनहट की लड़ाई के अगले दिन 30 जून 1857 को सैय्यद बरकत अहमद के नेतृत्व में हिंदुस्तानियों ने इस विदेशी गढ़ पर गोलाबारी शुरू कर दी। क्रांतिकारियों ने 86 दिन तक यहां कब्जा रखा। इस दौरान तमाम अंग्रेज परिवार यहां कैद रहे। 17 नवंबर 1857 की रात मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने रेजीडेंसी पर आखिरी हमला किया जिसके दूसरे दिन कॉलिन कैंपबेल कानपुर से सेना लेकर आए और फिर इस पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया। 

इमारत में दफन है 2000 अंग्रेज सैनिक

रेजीडेंसी में रहने वाले ब्रिटिश अधिकारीयों में हेनरी मोंटगोमेरी लारेन्स को 1857 में विद्रोही सैनिकों ने धूल चटा दी और उन्हें वापस जाना पड़ा। इस युद्ध में हेनरी मोंटगोमेरी लारेन्स की मौत हो गई थी। इस संग्राम की गोली-बारी के निशान आज भी रेजीडेंसी में देखे जा सकते हैं। 1857 में अंग्रेज सेना के लगभग 2000 सैनिकों को बिना अंतिम संस्कार रेजीडेंसी में दफना दिया था। 

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