लखनऊ में बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआइपी) में शोध कार्यों के लिए एक नई इमारत तैयार की जा रही है। इस इमारत में जियोलॉजी, नदी विज्ञान डेंड्रोक्रोनोलॉजी, आर्कियोलॉजी, पैलियोनटोलॉजी, जियो केमिस्ट्री समेत कई अन्य विषयों पर वृहद स्तर पर शोध किए जा सकेंगे।

 इमारत को ग्लोसोप्टेरिस की पत्ती की संरचना पर बनाया जाएगा

इस इमारत को विलुप्त हो चुकी ग्लोसोप्टेरिस की पत्ती की संरचना पर बनाया जा रहा है। ग्लोसोप्टेरिस एक ग्रीक शब्द है। ग्लोसा का अर्थ जीभ और टेरिस का अर्थ पत्ती होता है। अपने खास डिजाइन के कारण जीवाश्म में शोधार्थियों के लिए इस पत्ती की पहचान बहुत आसान होती है। यह लगभग 25 से 30 करोड़ वर्ष पहले पाई जाती थी। जीवाश्म साक्ष्यों के अनुसार, यह पौधा विभिन्न परिवेशों में अलग-अलग प्रकार से पनपता था। भारत का 99% कोयला इन्हीं पत्तियों और इनसे जुड़े पौधों से बना है।

भारत के साथ ही साथ यह ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, मेडागास्कर, अंटार्कटिका और साउथ अमेरिका में भी पाई जाती थी। इन सभी का वेजिटेशन तब एक सा होता था। प्रो. बीरबल साहनी ने ग्लोसोप्टेरिस की गहन व्याख्या की थी और उन्होंने भारत एवं आस्ट्रेलिया की वनस्पतियों की चीन एवं सुमात्रा की वनस्पतियों के सापेक्ष अंतर भी बताए थे।

नई इमारत के संदर्भ में संस्थान की निदेशक डॉ वंदना प्रसाद ने बताया कि यह छह मंजिला इमारत बनाई जाएगी। इस इमारत में ग्लोसोप्टेरिस की पत्ती को विशेष रूप से डिजाइन किया जा रहा है। इस पत्तीनुमा संरचना में सोलर पैनल प्रणाली लगाई जाएगी जिससे पूरी इमारत को ऊर्जा मिलेगी। इसे इकाना स्टेडियम बनाने वाली स्काइलाइन आर्किटेक्ट नामक कंपनी तैयार कर रही है। इस इमारत को तैयार होने में लगभग 18 महीने का समय लगेगा।

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