कानपुर में औद्योगीकरण के आगमन के बाद से, इस शहर की प्रतिष्ठित टेनरियों और मिलों का देश दुनिया में काफी उल्लेख किया गया है। लेकिन एक ऐसे शहर के लिए जो रामायण के समय से है, यहाँ के अनेक ऐतिहासिक स्थान जो शहर की समृद्ध संस्कृति को श्रद्धांजलि प्रदान करते हैं,ऐसे स्थानों की मौजूदगी बीते हुए समय का वो राग गुनगुनाती है जो हमे बार बार सुनना चाहिए। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, हम आपके लिए ऐसे 9 स्थानों की सूची लेकर आए हैं जो आपको कानपुर के बारे में अधिक जानने में मदद करेंगे।

कोस मीनार


जी.टी. शेर शाह सूरी द्वारा बनाई गई सड़क, जो आज के पाकिस्तान को बांग्लादेश की सीमाओं से जोड़ती है, शेरशाह सूरी ने अपने राज्य के मार्गों पर हर कोस पर एक मीनार बनवाई थी। कोस का मतलब है-दूरी जो लगभग दो मील या सवा तीन किमी के बराबर होती है। मीनारों को देखकर सैनिक काफिले चलते थे और डाक सिस्टम भी इन्हीं की तर्ज पर चलता था।। कोस मीनार के नाम से जाने जाने वाले इन मील के पत्थरों को एक दूसरे से 1 कोस (3.2 किमी) की दूरी पर रखा गया था। यह कानपुर के ग्रामीण विस्तार में पाई जाने वाली एक ऐसी मीनार है जो 3 फीट लंबी है और चूने की परतदार पुरानी ईंटों से बनी है।

जाजमऊ टीला


कानपुर शहर का पूर्वी छोर जाजमऊ के टीले से चिह्नित है, जिसे जाजमऊ टीला के नाम से जाना जाता है। प्राचीन काल में इसे सिद्धपुरी कहा जाता था और यह पौराणिक राजा ययाति का राज्य था। जब फिरोज शाह तुगलक ने दिल्ली सल्तनत पर शासन किया, तो उन्होंने 1358 में यहां एक प्रसिद्ध सूफी संत का मकबरा बनवाया। इसके अलावा, 1950 के दशक के अंत में, यहां की गई खुदाई में 600 ई.पू. पुरानी कलाकृतियां मिली हैं।

निंबिया खेरा ईंट मंदिर


एक प्राचीन ईंट मंदिर, जिसका निर्माण 11वीं या 12वीं शताब्दी के आसपास का माना जाता है, यह कानपुर के ग्रामीण भागों में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है। इसे पंचायतन शैली भी कहा जाता है क्योंकि मुख्य हॉल के प्रवेश द्वार के प्रत्येक कोने पर एक उप-मंदिर स्थित है। जबकि यह शिव मंदिर ईंट और चूने से बना है, इसके मध्य क्षेत्र की ओर जाने वाला मुख्य द्वार बलुआ पत्थर से बना है।

जनरल सर ह्यूग व्हीलर की खाई


जब भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की आग मेरठ से कानपुर तक पहुंची, तो इस शहर में तैनात सेना ने आगामी हमलों का मुकाबला करने की तैयारी शुरू कर दी। मार्च 1858 में, जनरल सर ह्यूग व्हीलर ने यूरोपीय समुदाय के लिए संभावित शरण के रूप में कानपुर के बाहरी इलाके में दो बैरकों के आसपास एक मजबूत स्थान का निर्माण किया। आज, इस स्थान को जनरल सर ह्यूग व्हीलर की खाई के रूप में जाना जाता है।

वाल्मीकि आश्रम


कानपुर के बिठूर क्षेत्र में स्थित वाल्मीकि आश्रम है, जो इस दावे के प्रमाण के रूप में खड़ा है कि यह शहर रामायण के युग से है। ऐसा माना जाता है कि ऋषि वाल्मीकि ने यहां महाकाव्य लिखा था और इसके परिसर में संरक्षित सीता की रसोई, सीता कुंड और दीप मलिका स्तम्भ हैं। इसके अलावा, कई लोग यह भी मानते हैं कि यह वह स्थान है जहाँ भगवान राम और देवी सीता के पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ था।

कचेरी कब्रिस्तान


1765 में अपने अस्तित्व का दावा करते हुए, जब यूरोपीय सैनिकों ने अवध के तत्कालीन नवाब के साथ एक संधि पर बातचीत की, इस कब्रिस्तान को मूल रूप से अधिकारियों के दफन मैदान के रूप में जाना जाता था। 1857 के विद्रोह के बाद, फ्लैगस्टाफ बैरकों को कचेरी कानून न्यायालयों द्वारा बदल दिया गया और इस स्थान को कचेरी कब्रिस्तान के रूप में जाना जाने लगा। यहां का सबसे पहला पत्थर लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन स्टेनफोर्थ का है और इसकी स्थापना वर्ष 1781 है।

मूसानगर


कानपुर से लगभग 50 किमी दूर स्थित मुसानगर एक ऐसा क्षेत्र है जिसे एक अद्वितीय पुरातात्विक स्थल माना जाता है। कई प्राचीन कलाकृतियाँ और नमूने जो हड़प्पा के बाद के युग, शुंग युग, मौर्य युग और कुषाण काल ​​से संबंधित हैं,की यहाँ खुदाई की गई है। इसके अलावा, यह स्थान प्राचीन मुक्तादेवी मंदिर में आयोजित मेले के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे राजा बलि द्वारा प्रत्येक कार्तिक पूर्णिमा पर त्रेता युग के दौरान बनाया गया था।

लाला भगत


लगभग पहली शताब्दी में वापस जाएँ तो एक नर मुर्गी के आकार की अनूठी प्रयत्न प्रतिमा है, जिसे लाला भगत के रूप में जाना जाता है। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, इस प्रतिमा को देवी कालिका का आशीर्वाद प्राप्त है और यह किसी भी अन्य देवता के समान महत्व रखती है। इसके अलावा, साढ़े छह फीट लंबा लाला भगत स्तंभ- जिसे कुक्कुटद्वाज के नाम से भी जाना जाता है, आधुनिक मंदिर के बीच में स्थित है। यह स्तंभ अष्टकोणीय रूप से लाल बलुआ पत्थर के स्तंभ से बना है और इसमें एक छोटा शिलालेख है।

कानपुर मेमोरियल चर्च


1857 के युद्ध के दौरान मारे गए ब्रिटिश सैनिकों के सम्मान में निर्मित, कानपुर मेमोरियल चर्च को पूर्वी बंगाल रेलवे के वास्तुकार- वाल्टर ग्रानविले द्वारा डिजाइन किया गया था। आधिकारिक तौर पर ऑल सोल कैथेड्रल चर्च के रूप में जाना जाता है, इसका निर्माण लोम्बार्डिक गोथिक शैली में किया गया है और इसे चमकदार लाल ईंटों में आकर्षक आकार दिया गया है। इस चर्च के पूर्व की ओर इसका मेमोरियल गार्डन है, जिसके केंद्र में बैरन कार्लो मारोचेट्टी द्वारा उकेरी गई एक देवदूत की मूर्ति है।

नॉक नॉक

प्राचीन काल में,आज का कानपुर नगर और देहात एक ही शहर का हिस्सा थे और इस शहर ने कई पहलुओं में उल्लेखनीय विकास किया। हालांकि कई सारे शासकों के आवागमन से शहर की शहर की स्थिति पर काफी प्रभाव पड़ा और एक समय पर इतिहास में कानपुर का स्थान गुमनामी की सुरंग में चला गया। हमें उम्मीद है कि इन 9 स्थानों के माध्यम से एक आभासी सैर इस शहर की खोई हुई महिमा को पुनर्जीवित करने में मदद करेगी।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए क्लिक करें- सुगंधा पांडेय