कानपुर ने स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और बूढ़ा बरगद की कहानी उसी बलिदान और देशभक्ति का प्रतीक है। यह बरगद आज भी स्वतंत्रता के लिए देश के समर्पण की गवाही देती है। वैसे तो यह पुराना बरगद का पेड़ अब जीवित नहीं है, लेकिन इसकी जड़ें अभी भी अतीत से जुड़ी हुईं हैं और आज भी शहर से जुड़ी हुई एक तकलीफदेह कहानी को प्रकट करती हैं।

बूढ़ा बरगद का महत्व


कानपुर के नाना राव पार्क में स्थित, इस पेड़ पर स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण अवधि के दौरान 144 भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी पर लटका दिया गया था। कहानी के अनुसार, पूरे क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों ने नाना राव पार्क में बूढ़ा बरगद के पेड़ पर ब्रिटिश युद्ध में अपनी कार्ययोजना की रणनीति बनाने के लिए मुलाकात की और यह एक बहुत बड़ी विडंबना थी कि, ठीक इसी स्थान पर जहाँ इन लोगों को मृत्यूदंड दिया गया था।

इस घटना से अंग्रेजों ने अपने क्रोध और स्वतंत्रता के लिए किसी भी आंदोलन को जड़ से कुचलने की उनकी ताकत को दर्शाया था। हालांकि, इस घटना ने सेनानियों के बीच चिंगारी को हवा दी, जिसके चलते इन अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ाई और भी प्रबल हो गई थी।

घटना की तरह ही पेड़ ने दम तोड़ दिया और इसके साथ ही कई स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन पर पूर्ण विराम लग गया। अब यहां जो कुछ बचा है, वह शहीद स्थल स्मारक है, जो उन लोगों की देशभक्ति को अमर करता है जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपनी जान दी।

हालांकि उत्तर प्रदेश की सरकार ने बूढ़ा बरगद की सुरक्षा के लिए एक बैरिकेड्स लगा दिया था क्योंकि समय के साथ समाज के असामाजिक तत्वों ने शहीदों के स्मारक को भी सोने की जगह बना दिया है। कभी दूर तक फैले हुए इस पेड़ का अब छोटा सा हिस्सा ही बचा हुआ है।

नॉक-नॉक

वर्तमान में इंडियन नेशनल ट्रस्ट ऑफ आर्ट कल्चर एंड हेरिटेज की मदद से पुराने पेड़ की एक छोटी शाखा को यहां संरक्षित किया जा रहा है। इन प्रयासों से न केवल प्रतिष्ठित पेड़ को पुनर्जीवित करने की उम्मीद है, बल्कि हमारे बहादुर सेनानियों की वीरगाथाओं को भी संरक्षित रखने की कवायद है।

पता: कानपुर में नाना रो पार्क एलआईसी भवन के पास, माल रोड पर स्थित है। पर्यटक यहां पहुंचने के लिए टैक्सी, ऑटो-रिक्शा या निजी वाहन ले सकते हैं।

समय: 5:00 AM - 8:00 PM

प्रवेश शुल्क: ₹20