इतिहास के अध्ययन के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक वास्तुकला है, यही वजह है कि इसे अक्सर निर्मित विरासत कहा जाता है। यह मनुष्य और सभ्यता की प्रगति का दस्तावेजीकरण करता है। कानपुर शहर से करीब 50 किमी दूर भीतरगाँव मंदिर उसी स्थान पर खड़ा है जहां इसे गुप्त काल के दौरान बनाया गया था और यह पंद्रह शताब्दियों से चारों ओर घनी मानव आबादी के बीच चट्टान सा खड़ा है। आइए व्यक्तिगत रूप से इस मंदिर की यात्रा करने से पहले एक वर्चुअल दौरे के साथ कानपुर जिले के वास्तुशिल्प रूप से समृद्ध किनारों का पता लगाएं।

बीते युग की स्थापत्य कुशलता की गवाही देता हुआ स्मारक

एक टेराकोटा पैनल के सामने एक सीढ़ीदार ईंट की इमारत, भितरगांव मंदिर छठी शताब्दी में गुप्तों के शासनकाल के दौरान बनाया गया था। ऐसा माना जाता है कि यह सबसे पुराना बचा हुआ टेराकोटा हिंदू मंदिर है जिसमें एक छत और एक ऊंचा शिखर है। इस मंदिर को 1877 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा देखा गया था, जब अलेक्जेंडर कुनिघम और उनके सहयोगियों ने एक स्थानीय जमींदार के निमंत्रण पर इस स्थल का दौरा किया था।

पूर्व की ओर मुख वाला यह मंदिर एक चौकोर बनाया गया है, जिसके भीतरी जगह के ऊपर एक लंबा पिरामिडनुमा शिखर (pyramidical spire) है, जिसे गर्भगृह के रूप में भी जाना जाता है। इसके अलावा, मंदिर की दीवारों को टेराकोटा पैनलों से सजाया गया है, जिसमें जलीय राक्षसों और हिंदू देवताओं को दर्शाया गया है। अठारहवीं शताब्दी में इस मंदिर में बिजली गिरने के बाद, ऊपरी कक्ष नष्ट हो गया था और वर्तमान में इसके स्थान पर जो संरचना दिखाई दे रही है, वह काफी हद तक एक दोबारा बनायी गयी डिजाइन है।

नॉक नॉक

भारत में, धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष इमारतें,कारीगरों और श्रमिकों के कौशल और बीते हुए काल के शासकों के संसाधनों की गवाही देती हैं। एक सड़क यात्रा करके इस सुन्दर और पुरातन मंदिर जाकर इतिहास की यात्रा करें। इसके अलावा, अपनी यात्रा पत्रिका में इस जगह का दस्तावेजीकरण करना न भूलें ताकि यहां अनुभव की गई पुरानी दुनिया का आकर्षण आपकी यादों में जीवन भर बना रहे। 

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