राजस्थान के हर कोने में वहां की समृद्ध संस्कृति और राजसी रहन सहन की चमक देखने को मिलती है। राजस्थान के महल जितने अलंकृत और आकर्षक हैं, वहां का स्थानीय रहन सहन भी उतना ही रंगीला और गहरा है। सदियों से राजाओं, रानियों और स्थानीय लोगों ने अपने सर्वस्व को बलिदान करके अपने गौरव की रक्षा की है। आज हम आपको राजस्थान के 'खेजड़ी' जो की राज्य का राजकीय वृक्ष भी है, उसके इतिहास और राजस्थान के लोगों के बीच उसकी प्रासंगिकता के विषय में बताएँगे।

खेजड़ी पश्चिमी राजस्थान का सबसे प्रमुख वृक्ष है; और इसी कारण से खेजड़ी को राजस्थान का राजकीय वृक्ष भी कहा जाता है। 1982-83 में इसे राजकीय वृक्ष घोषित किया गया था। खेजड़ी के पेड़ का वैज्ञानिक नाम 'प्रोसोपिस सिनेरिया' (Prosopis cineraria) है। भारत में, इसे क्षेत्र के आधार पर शमी, खिजरो, झंड, जाट, खार, कांडा और जम्मी जैसे कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। राजस्थान में इसे खेजड़ी या 'खेजरो' कहा जाता है। इसे मध्य पूर्व क्षेत्र में गफ़ कहा जाता है। पेड़ मध्य पूर्व क्षेत्र में भी मौजूद है और इसे गफ ट्री कहा जाता है। राजस्थान की सीमा से लगे हरियाणा के कुछ हिस्सों में समान पारिस्थितिक स्थिति वाले स्थानों पर भी खेजड़ी के पेड़ भी मिल सकते हैं।

खेजड़ी के पेड़ का राजस्थान और भगवान राम से जुड़ाव


पेड़ का जयपुर के इतिहास से गहरा नाता है। राजघराने के दिनों में राजा, दशहरे के दिन जयपुर के 'दशहरा कोठी' (Dashara Kothi) में खेजड़ी के पेड़ की पूजा करते थे। जयपुर के शासक भगवान राम के वंशज कच्छवा राजपूत थे। ऐसा माना जाता है कि लंका के राजा रावण के साथ अंतिम युद्ध से पहले भगवान राम ने खेजड़ी के पेड़ की पूजा की थी। इस युद्ध में भगवान राम ने रावण का वध किया था। दशहरा दिवाली से पहले के त्योहारों में से एक है और भगवान राम की इस जीत का उत्सव है। जयपुर राजघराने में खेजड़ी के पेड़ की पूजा करने की यह परंपरा आज भी छोटे-छोटे तरीकों से जारी है।

सांस्कृतिक रूप से, पेड़ राजस्थानी लोगों, विशेषकर 'बिश्नोई' लोगों के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पेड़ को कई लोगों द्वारा इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक महत्व देकर 'तुलसी' के रूप में पवित्र माना जाता है।"

खेजड़ी पेड़ पहले के समय में पश्चिमी राजस्थान में लोगों की जीवन रेखा थी। यह जलाऊ लकड़ी प्रदान करता था और यहां तक कि नकदी फसल के रूप में भी काम करता था। कुछ दस्तावेजों से पता चलता है कि 1869 में राजपूताना के अकाल के दौरान खेजड़ी की छाल को आटे के रूप में इस्तेमाल किया गया था। आज भी छाल का उपयोग कुष्ठ रोग, फोड़े और खुजली जैसी कई त्वचा की स्थितियों के इलाज में किया जाता है। आयुर्वेद में इसका उपयोग अस्थमा के इलाज में किया जाता है।

खेजड़ी पेड़ और बिश्नोई समुदाय का विरोध


ऐसा कहा जाता है कि 11 सितम्बर,1730 को, जोधपुर के पास एक छोटे से रेगिस्तानी गांव में, 363 बिश्नोई लोगों ने एक बहादुर महिला के नेतृत्व में राजा के आदमियों द्वारा खेजड़ी के पेड़ों को काटने का विरोध किया था जिसके चलते उन्हें अपनी जान गवानी पड़ी। अपने समुदाय के पूजनीय खेजड़ी के पेड़ों को कटता हुआ देखने के बजाये उन्होंने अपनी जान देना बेहतर समझा। राजा के आदमी खेजड़ी के पेड़ों को काटने और जोधपुर के मेहरानगढ़ किले तक ले जाने के मिशन के साथ आये थे। महाराजा अभय सिंह ने एक नया महल बनाने का फैसला किया था और निर्माण सामग्री के लिए भट्टों को रखने के लिए लकड़ी की जरूरत थी। 2013 में, पर्यावरण और वन विभाग ने 11 सितंबर को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस के रूप में घोषित किया। सर्वोच्च बलिदान की इस गाथा का भारत भर के पर्यावरणीय आंदोलनों, विशेष रूप से चिपको आंदोलन पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।