इको-फेमिनिज़्म (Eco-Feminism ), नारीवाद को प्रकर्ति से जोड़ने का फलसफा है। यह माना जाता है कि महिलाओं और प्रकृति के बीच कुछ महत्वपूर्ण संबंध हैं। महिलाओं का सम्मान करने वाला समाज भी पारस्परिकता, सद्भाव और सहयोग को महत्व देता है। कुछ समाज जिनमें लैंगिक समानता (Gender equality) की कमी है, वे भी प्रकृति और महिलाओं के उत्पीड़न के साथ आत्म-केंद्रित, भौतिकवादी मानसिकता के साक्षी हैं। हमें यह समझना होगा की सामजिक जीवन का रथ एक पहिये से नहीं चलता, फिर भी न जाने क्यों दुसरे पहिये की पहचान कम है। भारत में राजस्थान में स्थित एक गांव पर्यावरण के साथ नारीवादी प्रथाओं (Feminist Practices) को लागू करने और इस प्रक्रिया में चमत्कारिक रूप से खुद को बदलने में एक आदर्श बन गया है।

हिम्मत से भरे एक कदम ने 'पिपलांत्री' को आदर्श गांव बना दिया


राजस्थान का पिपलांत्री नामक गांव एक समय पर कई बड़ी समस्याओं से जूझ रहा था - पास की संगमरमर की फैक्ट्रियों से औद्योगिक प्रदूषण, पानी की कमी, बिजली की कमी, बाल विवाह, कन्या भ्रूण हत्या, अशिक्षा, अपराध और बहुत कुछ। लेकिन गांव के उस समय के सरपंच 'श्याम सुंदर पालीवाल' का एक सपना था- पिपलांत्री को एक आदर्श गांव बनाने का। 2006 में उन्होंने गांव में एक लड़की के पैदा होने पर 111 पेड़ लगाने की अनूठी पहल शुरू की और आज दस साल बाद पिपलांत्री एक आदर्श गांव है, जिससे देश के हर गांव को प्रेरणा मिली है।


इस अनोखी यात्रा की शुरुआत तब हुई जब एक केवल 8वीं पास लड़के ने शहर को छोड़कर जाने से बेहतर वहां रहकर समस्याओं का डटकर सामना करने का दृढ निश्चय किया। श्याम सुन्दर पालीवाल ने चुनाव लड़ा और 2005 में एक युवा 'सरपंच' बने। उनकी हिम्मत ने शहर की काया पलट कर दी। श्याम सुंदर पालीवाल वह व्यक्ति हैं जिन्होंने निचले सामाजिक दृष्टिकोण के साथ-साथ राज्य के पर्यायवरण दोनों क्षेत्रों में क्रांति ला दी है। दृढ़ संकल्प, अटूट मेहनत और सभी ग्रामीणों के सहयोग के माध्यम से, उन्होंने गांव के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को पूरी तरह से बदल दिया। वे आज "इको-फेमिनिज्म के जनक" के रूप में सम्मानित हैं।


सद्भाव और इंसानियत से भरी एक पहल

नारी वह जो सूर्य सी उदय हो,

वह जिसके ह्रदय में धूप का ज्वालाकरण हो,

शीत की हर लहर से अनछुई रह जाए

इतना ताप उसमें उत्पन्न हो।"

ग्राम पंचायत ने दिन-रात का कार्यक्रम शुरू किया - "पंचायत आपके दरवाजे पर", हर घर में जाकर उनकी समस्याओं को समझा और पंचायत का गांव के लिए जो दृष्टिकोण था, उस पर चर्चा की। जागरूकता पैदा करने और पानी के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने के लिए "स्वजलधारा योजना" नामक कार्यक्रम शुरू किया गया था। इन्ही क़दमों के बीच श्याम सुन्दर पालीवाल जी के साथ दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी और उन्होंने अपनी बेटी को खो दिया। इस कठिन परिस्थिति में भी हिम्मत के दामन को ना छोड़ते हुए उन्होंने गांव में प्रत्येक बेटी के जन्म पर 111 पेड़ लगाने की पहल शुरू की। इसके साथ ही बच्ची के भविष्य की सुरक्षा के लिए, ग्रामीण आमतौर पर 21000 रुपये का दान देते हैं। जो माता-पिता की राशि के साथ 10000 रुपये 20 साल के लिए बच्चे के नाम के तहत एक बैंक खाते में फिक्स किया जाता है। माता-पिता भी यह सुनिश्चित करने के लिए एक एफिडेविट पर हस्ताक्षर करते हैं कि पैसे केवल तभी निकाले जा सकते हैं, जब वे अपनी बेटियों को शिक्षा के लिए ज़रूरी हों और इसके साथ ही कानूनी उम्र के बाद ही उनकी शादी कर सकते हैं और उनके द्वारा लगाए गए पेड़ों की देखभाल करते रहें।


सामाजिक मुद्दों और पर्यावरण के बीच इस अद्भुत बंधन के प्रतीक के रूप में, पिपलांत्री गांव में और एक लाख से अधिक पेड़ खड़े हैं। पालीवाल जी की दूरदर्शिता और ग्रामीणों के प्रयासों ने आखिरकार पिपलांत्री को प्रतिष्ठित "निर्मल ग्राम पुरस्कार" अर्जित करने में मदद की है। 4 मई, 2007 को उनके कठोर प्रयासों और दूरदर्शी दृष्टि के लिए, श्याम सुंदर को राष्ट्रपति पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।


लंबे समय तक चलने वाले परिवर्तन की सबसे अधिक संभावना तब होती है जब यह स्व-प्रेरित और सकारात्मक सोच के साथ किया जाए। यह खूबसूरत परंपरा न केवल गांव में महिलाओं के लिए गहरी प्रशंसा को बढ़ावा देती है, बल्कि यह पर्यावरण प्रबंधन की एक उल्लेखनीय भावना भी पैदा करती है। यह गांव इस बात की मिसाल पेश करता है कि भारत में महिलाओं के जन्म को अशुभ मानने के बजाय कैसे ख़ुशी और पूरे सम्मान के साथ मनाया जाना चाहिए।