एक कला इतिहासकार स्टेला क्रैमरिश लिखती हैं, "ऋग्वेद और उपनिषदों में, ब्रह्मांड की कल्पना देवताओं द्वारा बुने हुए कपड़े के रूप में की गई है।" इसलिए, यह स्पष्ट होता है की साड़ी या कालीन जैसे कपड़े के किसी बड़े टुकड़े की परंपरा और महत्व भारत में कितना अधिक है। सदियों से,चाहे वो किसी आम व्यक्ति का घर हो या राजा महाराजाओं के महल,कालीन सभी संरचनाओं की शोभा बढ़ाती आयी हैं। साधारण से साधारण चार दीवारी बारीक कढ़ी हुई कालीन के साथ अत्यधिक शाही लगने लगती है।

भारत में गुलाबी शहर कालीनों के लिए एक प्रमुख सोर्सिंग केंद्र रहा है, जो इस शहर की समृद्ध कलात्मक विरासत को एक साथ जोड़ता है। जयपुर की इस सौंदर्य परंपरा के बारे में कुछ तथ्यों को हम आप तक लाने का प्रयास कर रहे हैं।

राजस्थान का कालीन हब


हालांकि कहा जाता है कि भारत में कालीनों का आगमन गौरी और गजनी के आक्रमणों के साथ हुआ था, लेकिन कालीन बुनाई की शुरुआत मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान हुई। उसने अपने शाही दरबार और महलों के लिए फारसी कालीनों को संरक्षण दिया। राजस्थान में, कालीनों को पहली बार 17वीं शताब्दी में निर्मित होना शुरू हुईं, जब अफगानिस्तान के कालीन बुनकरों को शाही शिल्पकारों से मिलवाया गया था।

हालाँकि, दरियाँ जो पारंपरिक रूप से भारत से संबंधित हैं,माना जाता है कि वे सिंधु घाटी सभ्यता में उत्पन्न हुई हैं। यह राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध बुनाई परंपराओं में से एक है जिसमें काफी सारे रंगों के साथ ज्यादातर जियोमेट्रिक और फूलों के पैटर्न का उपयोग किया जाता है। धीरे-धीरे, भारत में दो बुनाई की परंपराएं आपस में जुड़ गईं और भारतीय कालीन उद्योग को एक नया सौंदर्य प्रदान किया।

राजस्थान में, जयपुर हस्तशिल्प बुनाई के केंद्र के रूप में उभरा है क्योंकि हाथ से बुने हुए ऊनी कालीनों और सूती दरियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों से खरीदारों को आकर्षित करना किया है। इस शहर की प्रमुखता में वृद्धि का कारण कारीगरों और कच्चे माल की उपलब्धता थी जो इन बुने हुए कालीनों को बनाने के लिए आवश्यक हैं।

जयपुर से प्यार के साथ


विशेष रूप से राजपूत राजाओं के संग्रह में उपलब्ध ऐतिहासिक डिजाइनों से प्रेरित, कोलोनियल काल के दौरान जयपुर सेंट्रल जेल के कैदियों ने प्रतिष्ठित डिजाइन वाले बड़े कालीन बनाए थे। उनके डिजाइन और काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुए और उन्हें कॉन्विक्ट कार्पेट (Convict Carpets) के नाम से जाना जाने लगा। कहा जाता है कि 20वीं सदी में जयपुर जेल को दिल्ली में वायसराय हाउस के लिए कमीशन के साथ कालीनों का काम मिला था।

आज, इन जेल में बनी कालीनों को कीमती माना जाता है, नीलामी में बेचा जाता है और संग्रहालयों द्वारा प्रतिष्ठित किया जाता है क्योंकि वे भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में, सामाजिक उद्यमों ने जेल के कैदियों के लिए सुधार परियोजनाओं के रूप में कालीन बुनाई शुरू की है। जयपुर रग्स का स्वतंत्रता मंचा संग्रह (Jaipur Rugs' Freedom Manchaha) जयपुर जेल के कैदियों द्वारा बनाया जाता है, हालांकि, औपनिवेशिक समय के विपरीत, वे चुन सकते हैं कि वे भाग लेना चाहते हैं या नहीं और वे कौन से डिज़ाइन बुनाई करना चाहते हैं।

नॉक नॉक


शानदार ढेर कालीनों से लेकर मामूली सूती दरियों तक, भारतीय फर्श को सुशोभित करने वाली खूबसूरत कालीनें भारतीय कपड़ा उद्योग का एक महत्वपूर्ण और विश्व-प्रसिद्ध हिस्सा है। पारंपरिक बुनाई समुदायों से परे, यह राजस्थानी जेलों के कैदी हैं जिन्होंने जयपुर के महाराजा द्वारा जयपुर में पहली जेल कालीन फैक्ट्री शुरू करने के दो सदियों बाद बुनाई के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल और परंपराओं को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं।