राजस्थान अपने रंग, शिल्प और प्रदर्शनकारी कलाओं से जाना जाता है जो वर्षों से इसके रेगिस्तानी परिदृश्य का हिस्सा हैं। ऐसी ही एक स्थानीय कला है 'कठपुतली का खेल' जो राजस्थान के मनोरंजन के स्त्रोतों में सबसे एक है। ये जयपुर के पर्यटन का एक अमूल्य हिस्सा हैं क्यूंकि यह उन प्रमुख केंद्रों में से एक है जहां कठपुतिलियों का निर्माण होता है दुनिया भर के पर्यटक राजस्थान के इस सांस्कृतिक पहलू का आनंद लेने आते हैं।

कठपुतली कला की विषय-वस्तु ऐतिहासिक कथाओं और स्थानीय परंपराओं से प्रेरित हैं



कठपुतली का शाब्दिक अर्थ 'लड़की का खिलौना' है। कठपुतलियों का खेल एक प्राचीन लोक रंगमंच की कला है, जहां बड़े पैमाने पर कठपुतलियों का निर्माण किया जाता है। कठपुतली कारीगर इन्हें लकड़ी और कपड़े से तैयार करते हैं। फिर इन्हें ठेठ रंग बिरंगे राजस्थानी परिधान जैसे बांधनी और लेहरिया से सजाया जाता है उसके बाद कलाकार ढोलक की थाप पर कठपुतलियों को डोरियों से नचाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। कलाकर कठपुतलियों के खेल के माध्यम से विभिन्न प्रकार की लोक, सामाजिक एवं बच्चों की कथाएं सुनाते हैं।



जिन प्रसंगो के आस पास ये कठपुतलियों के खेल प्रदर्शित किये जाते हैं आमतौर पर राजस्थान की ऐतिहासिक कहानियों और स्थानीय परंपराओं से उनकी उत्पत्ति होती है। कृषक रहे और यायावर जीवन बिताने वाले भट्ट समुदाय के लोग पुरातन समय से कठपुतिलों के खेल की कला को प्रदर्शित कर रहे हैं। आज भी,वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने के लिए देश भर में यात्रा करते हैं, आम तौर पर शाम के घंटों के दौरान और कई लोगों द्वारा उन्हें कठपुतलीवालों के रूप में संदर्भित किया जाता है। उनकी सुनाई हुई कहानियां इतनी लोकप्रिय हुई की उन्हें राज दरबारों का सरंक्षण प्राप्त हुआ और मध्य राजस्थान के सभी प्रमुख दरबारों के पास अपना एक कठपुतलीवाला रहता था जिसे चरन भी कहा जाता था।



कठपुतलीवाले अपनी कठपुतलियों का अपने बच्चों की तरह ध्यान रखते हैं। हर एक कठपुतली को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दिया जाता है और जब किसी कठपुतली को आगे कला में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता तब उसे मृत मानकर प्रार्थना कर नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। यह माना जाता है की जितनी देर कठपुतली पानी के ऊपर रहती हैं उतना ज़्यादा उसका अस्तित्व कलाकारों के लिए सौभाग्यशाली था।



लेकिन समय के साथ और मनोरंजन के संसाधनों में जो बढ़ोतरी हुई है उससे कठपुतली की कला क्षीण होती गयी। आज समकालीन समय के अनुरूप रहने के लिए कठपुतली के कलाकारों को लोक कथाओं को छोड़कर अक्सर हिंदी फिल्मों से प्रभावित कहानियां के साथ खेल का प्रदर्शन करना पड़ता है। यह बेहद अफ़सोसजनक है की उनकी आजीविका अब सतत नहीं है और अनेक कलाकार अपनी प्रिय कठपुतलियों को बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं। भारत की सदियों पुरानी कठपुतली कला आज अपने अस्तित्व को तरस रही है,कठपुतली कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा है। आज हमारे लिए आवश्यक है की ऐसी ऐतिहासिक कलाओं को संरक्षित करें सिर्फ उनके सांस्कृतिक महत्त्व के कारण ही नहीं बल्कि इसलिए क्यूंकि इन कलाओं को प्रदर्शित करने में अतुलनीय कलात्मक कौशल और समर्पण निहित है।

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