महिला सशक्तिकरण निसंदेह एक बहुआयामी सिद्धांत है लेकिन उसका मूल उद्देश्य महिलाओं की आर्थिक स्वंतंत्रता है। और अपने प्रयासों को इस लक्ष्य की ओर समर्पित करते हुए बाड़मेर की लता कछवाहा विदेशों में अपनी कढ़ाई शिल्प उत्पादों को बेंचने के लिए राजस्थान की महिलाओं की मदद कर रही हैं। महिलाओं को सशक्त करने के अलावा उनका उद्देश्य राजस्थान की कीमती हस्तशिल्प कला कशीदाकारी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलवाना है।

गांव के घरों से वैश्विक स्तरों तक कला की यात्रा




कशीदाकारी की कला राजस्थान की प्राचीन कला है जो शॉल, रुमाल, बिस्तर के कवर, कुशन और बैगों को सजाने में उपयोग की जाती है। अपनी प्रारंभिक यात्रा के बारे में बताते हुए लता जी ने कहा "तीन दशक पहले, बाड़मेर में जीवन काफी अलग था क्योंकि खेतों में काम करने वाली बहुत कम महिलाएं थीं, जहां होमगार्ड्स विभाग में एक महिला तैनात थी, वहां दो से तीन विधवाएँ थीं जो स्कूलों में काम करती थीं। इसलिए महिलाओं को काम करने के लिए खेतों में लाना काफी चुनौतीपूर्ण था लेकिन यह असंभव नहीं था''

जीवन में एक मुश्किल दौर से गुजरने के बाद वे जोधपुर गईं जहां पर एक सामाजिक काम ने उनका ध्यान आकर्षित किया। अपने अंदर की आवाज़ से प्रेरित होकर वह मगराज जैन द्वारा स्थापित श्योर (सोसाइटी टू अपलिफ्ट रूरल इकोनॉमी) नामक एक संगठन का हिस्सा बन गई।

वे कहती हैं की प्रारंभिक ट्रेनिंग प्रोग्राम में 100 से 200 महिलाएं शामिल थी लेकिन यह संख्या तेज़ी से बढ़ते हुए अगले 20 सालों में 15000 तक पहुंच गयी। इन महिलाओं को राष्ट्रीय और वैश्विक मार्किट से जोड़कर इस परियोजना ने उन्हें आय के संभ्रांत स्त्रोत की ओर केंद्रित किया है। जर्मनी, जापान, सिंगापुर और श्रीलंका की अनेक प्रदर्शनियों में प्रदर्शित, इन महिलाओं द्वारा तैयार उत्पादों को व्यापक प्रशंसा मिली है। घर की सजावट के सामान से लेकर विभिन्न प्रकार के कलात्मक उत्पादों ने फैबइंडिया, आइकिया, और रंगसूत्र जैसे उल्लेखनीय संरक्षकों का सरंक्षण मिला।

कशीदाकारी - मेघवाल समुदाय की महिलाओं द्वारा प्रसिद्ध कला है





बाड़मेर में अपने शुरुआती दिनों की बात करते हुए लता जी कहती हैं "जब मैं आई थी उस समय बाड़मेर में स्थिति कठिन थी क्यूंकि हर समय सूखा पड़ा रहता था। इसके अलावा, सड़कें नहीं थीं और दूरदराज के इलाकों में परिवहन और संचार एक चुनौती थी। और सबसे बड़ा मुद्दा पानी की कमी था। हम देखते थे की किस प्रकार महिलाएं जो अपनी कढ़ाई का काम करती थी उन्हें व्यापारी घेर लेते थे और कशीदाकारी के काम को बाजार में बेच लेते थे और महिलाओं को कमाई का एक छोटा सा हिस्सा जैसे 200 रुपये ही मिल पाता था।

वह बताती हैं कि इस गतिविधि में शामिल होने वाली बड़ी संख्या में महिलाओं के पास काशीदाकारी कढ़ाई में पर्याप्त कौशल है। आमतौर पर, वे मेघवाल समुदाय से हैं जिनके परिवारों ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद के क्षेत्र में घर बसा लिए। उनकी प्रतिभा को देखते हुए, लता ने इस कला की पहुंच का विस्तार करने का प्रण लिया, ताकि बेहतर वित्तीय लाभ इन महिलाओं को मिल सके।

नए फैशन ट्रेंडों को देखते हुए लता जी ने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नोलॉजी के प्रशिक्षित डिज़ाइनरों के साथ 1994 में गठन किया। उनके द्वारा आयोजित कार्यशालाओं के माध्यम से, उस समय के फैशन स्टैंडर्ड्स को देखते हुए 250 से अधिक डिजाइन विकसित किए गए। बाद में, महिलाओं को उनकी पहली ट्रेन की सवारी करवाने के साथ दिल्ली हाट ले जाया गया और उनके अनुभवों ने बड़ी योजनाओं के प्रवर्तकों को प्रेरित किया।

कई पुरस्कारों से सम्मानित एक सामाजिक कार्यकर्ता




लता बताती हैं कि विभिन्न पीढ़ियों की महिलाएं और लड़कियां अब इस परियोजना में शामिल हैं। एक तरफ बेटियां अपने पारिवारिक आय में योगदान दे रही हैं, दूसरी ओर वे पढ़ाई जारी रखने में भी सक्षम हैं।

अपनी उद्यमी योजनाओं के माध्यम से, लता ने सामाजिक विकास के क्षेत्रों में खुद के लिए एक विशेष जगह बनाई है। स्विट्जरलैंड सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में महिला रचनात्मकता के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित, लता ने महिला शक्ति पुरस्कार और वरिष्ठ नागरिक सेवा पुरस्कार जैसे कई राज्य पुरस्कार जीते हैं। लता कछवाहा जैसी महिलाएं आज की और आने वाली हर पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा हैं की जिनके ह्रदय में ईमानदारी और कुछ बेहतर करने की जिज्ञासा होती है उन्हें कोई सामाजिक लकीर नहीं रोक सकती।

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