कक्षा 12वीं की सीबीएसई परीक्षाओं को रद्द करने के केंद्र के फैसले को ध्यान में रखते हुए, राजस्थान सरकार ने 2 जून को कक्षा 10 और 12 के छात्रों के लिए राज्य बोर्ड परीक्षाओं को रद्द कर दिया। यह कदम राज्य के स्कूली छात्रों को घातक वायरस के संक्रमण से बचाने के लिए उठाया गया है। इसके अतिरिक्त, विद्यार्थियों के मनोबल को बढ़ाने और उनके समग्र शैक्षणिक तनाव को कम करने के लिए, कक्षा 1 से 6 के साथ-साथ कक्षा 8, 9 और 11वीं के छात्रों को परीक्षा के बिना सामूहिक रूप से पदोन्नत करने की घोषणा की गई है।

शिक्षकों और छात्रों को अस्थायी रूप से राहत, लेकिन भविष्य को लेकर है चिंता

हालांकि कई शिक्षकों और छात्रों ने राहत की सांस ली है, लेकिन अन्य इस बात को लेकर संशय में हैं क्योंकि यह कदम एक अल्पकालिक समाधान (short-term solution) है। शिक्षा प्रणाली में जो महामारी के कारण समस्याएं व अनिश्चितताएं उत्पन्न हुईं हैं, उनसे भविष्य में निपटना मुश्किल होगा। अभी भी कई लोग छात्रों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। आगे चल कर छात्रों के अकादमिक प्रदर्शन को किन मापदंडों पर आंका जाएगा और उन्हें मिलने वाले नंबरों का आधार क्या होगा, ऐसे सवाल अभी भी लोगों के मन में चिंता पैदा कर रहे हैं।

इसके अलावा, ई-लर्निंग और ऑनलाइन परीक्षा की वर्तमान में राज्य के ग्रामीण छात्र आबादी के लिए परेशानियां उत्पन्न की हैं और कथित तौर पर, ऐसे कई छात्रों ने कोई डिजिटल डिवाइस या इंटरनेट के अभाव में पढ़ाई छोड़ दी है। इन स्कूली बच्चों में से अधिकांश के लिए, उनकी आर्थिक स्थिति के कारण, 12 वीं कक्षा तक पहुंचने की धारणा भी असंभव है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में, बच्चों के पास तकनीक अभी भी नहीं पहुंची है, कई जगहों पर उन्हें घर पर उचित पोषण भी नहीं मिल पा रहा है। ये कारण भी पढ़ाई और विकास के रास्ते में अवरोध पैदा करते हैं।

डिजिटल लर्निंग से संबंधित इन समस्यायों ने स्कूली छात्रों के बीच मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है। उपरोक्त कारणों से, इस महामारी के दौरान छात्रों के लिए ऑनलाइन परीक्षाएं करवाना भी मुश्किल है, इसलिए न केवल राजस्थान बल्कि हरियाणा, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड ने भी अन्य राज्यों में अपनी-अपनी बोर्ड परीक्षाओं को रद्द कर दिया है।

युवाओं तक पहुंचने, उनकी चिंताओं को सुनने और उनका समाधान करने की आवश्यकता है

स्कूलों के बंद होने से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ा है। क्योंकि इसने उनके जीवन को डिजिटल स्क्रीन तक सीमित कर दिया है। सीखने और मनोरंजन गतिविधियों के लिए तकनीक पर निर्भरता बढ़ा दी है। बच्चों की दैनिक दिनचर्या पूरी तरह बदल गई है और वर्तमान में घर में कैद होने के कारण उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ने की संभावना बढ़ गई है।

इसके बारे में बात करते हुए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ अखिलेश जैन (एचओडी साइकेट्री, ईएसआई मॉडल हॉस्पिटल, जयपुर) ने कहा कि 24 मार्च, 2020 से अब तक ऑनलाइन क्लासेस ने क्लासरूम टीचिंग की जगह ले ली है। बच्चों और किशोरों पर इसके प्रभाव को अभी पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, सभी मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों (mental health conditions) में से 50% 14 साल की उम्र में सामने आ सकती हैं और ये मुद्दे अक्सर अनुपचारित रह जाते हैं। उन्होंने आगे बताया, कि यह आंकड़ा और भी अधिक परेशान करने वाला है जब भारत में दुनिया में सबसे बड़ी किशोर आबादी है।

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की वरिष्ठ राज्य कार्यक्रम प्रबंधक दिव्या संथानम ने आगे कहा कि युवाओं तक पहुंचने, उनकी चिंताओं को सुनने और उनके अनुसार उन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है।

छात्रों के लिए जल्द से जल्द आवश्यक उपायों की ज़रूरत है।

महामारी के चल रहे परिदृश्य को देखते हुए, विशेषज्ञों को रणनीति तैयार करने और एक अकादमिक रोडमैप तैयार करने की आवश्यकता है, ताकि छात्रों को उनके भविष्य के बारे में आश्वस्त किया जा सके। छात्रों पर किसी भी देश का भविष्य निर्भर करता है और इसलिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हम उनके सर्वांगीण विकास (all round development ) का ध्यान रखें और उन्हें आगे बढ़ने के लिए अवसर प्रदान करें।

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