दुनिया में कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो केवल किसी समस्या का केवल ज़िक्र ही नहीं करते बल्कि समस्या की पहचान करके,उसकी तह तक जाकर समाधान ढूंढ निकालते हैं। ऐसे व्यक्ति ही एक ऐसा नजरिया पेश करते हैं की दुनिया देखती रह जाती है। हम आज राजस्थान के सीकर शहर के रहने वाले एक साधारण किसान पद्मश्री सुंडाराम वर्मा की जिन्होंने वर्षों तक अपने खेतों में कठिन परिश्रम करके शुष्क क्षेत्रों में जलवायु संकट और पानी की कमी दोनों से लड़ने का एक तरीका खोजा।

सुंडाराम वर्मा एक 69 वर्षीय पर्यावरणविद् एवं कृषि वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया है और पिछले साल भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। 10 वर्षों तक काम करने के बाद, वर्मा ने शुष्क क्षेत्रों के लिए एक कृषि तकनीक विकसित की, जिसमें सिर्फ एक लीटर पानी से सभी प्रकार के पेड़ लगाए जा सकते हैं। वर्मा की जल-बचत तकनीक को ड्राईलैंड एग्रोफोरेस्ट्री कहा जाता है। उन्होंने इस तकनीक के माध्यम से 55,000 पेड़ लगाए हैं।

सुंदरम वर्मा की विशेष कृषि तकनीक


सुंडाराम वर्मा का परिवार परंपरागत रूप से खेती से जुड़ा रहा है। इसलिए, विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई करते हुए, उन्होंने अपने खेत में भी काम किया। उन्हें अपने खेत में वैज्ञानिक तरीकों से प्रयोग करना पसंद था। सुंडाराम वर्मा ने 1985 में ड्रायलैंड एग्रोफोरेस्ट्री नाम की इस विशेष तकनीक को विकसित किया, जो जल उपयोग की क्षमता को बढ़ावा देती है और उत्पादन पैदावार बढ़ाती है। कृषि के क्षेत्र में अभूतपूर्व इनोवेशन से ठीक एक साल पहले, मानसून की शुरुआत में, वर्मा ने अपने 17 एकड़ के परिवार वाले खेत की सीमाओं पर कई पौधे लगाए थे। नए पौधों को नियमित रूप से पर्याप्त पानी देने के बावजूद, अगले वर्ष गर्मी के मौसम में सभी पौधों की मृत्यु हो गई।

पानी के बिना खिले सारे पौधे


कोई अन्य विकल्प न होने पर, उन्होंने मानसून के दौरान फिर से गड्ढा खोदा, और नीम, मिर्च और धनिया के पौधे लगाए। लेकिन इस बार, सुविधा के लिए, वर्मा ने अपने खेत के ठीक बीच में स्थित अपने घर के करीब पौधे लगाए, जिसमें चावल, दाल, अनाज, फल और सब्जियां उगाई जाती हैं। इस बीच वह अपने खेत को समतल करने और फसल उगाने में मशगूल हो गए। इस बार फिर वह फसलों को पानी देने से चूक गए। लेकिन पेड़ बच गए। उन्होंने अंततः पाया कि यह सरल समतल प्रक्रिया थी जो जादू की तरह काम करती थी। अगले कुछ महीनों तक उन्होंने खुदाई, रोपण और जमीन को समतल करके प्रयोग किए। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वर्षा का पानी जो अंडरग्राउंड जमा था उसके कारण पेड़ जीवित रहे। इस तरह सुंदरम वर्मा ने एक ऐसी तकनीक पर काम करना शुरू किया जो मिट्टी में पानी को बंद कर सके। इस प्रकार शुष्क क्षेत्रों में पौधे स्वयं ही ही जल प्रदान करते हैं।

वे इन तकनीकों के बारे में अन्य किसानों के बीच लगातार प्रचार करते रहे हैं। दुनिया भर में विभिन्न कार्यशालाओं और सम्मेलनों के माध्यम से जैसे कि अधिक से अधिक लोग इनसे लाभान्वित होते हैं। राजस्थान की भीषण गर्मी और शुष्क धरती सुंडाराम वर्मा जी को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने से रोक न सकी। कोई आश्चर्य नहीं कि बढ़ते जलवायु संकट और मरुस्थलीकरण के समय सुंदरम वर्मा की पेड़ उगाने की अनूठी विधि ठीक वही है जिसकी हमें आवश्यकता है।