जैन समुदाय के एक प्रमुख नेता, एक परोपकारी और व्यावसायिक व्यक्ति, सेठ हुकुमचन्द को भारत के कॉटन प्रिंस के रूप में जाना जाता है। उनका जन्म 1874 में सेठ पुसाजी के परिवार में हुआ था, जिन्होंने इंदौर में होलकर मराठा वंश की स्थापना का समर्थन किया था। सेठ हुकुमचंद को एक व्यापारी के रूप में एक सम्मानजनक श्रेय मिला और विदेशों में भी यह माना जाता है कि न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज को भी उनकी मृत्यु पर दो दिन के लिए बंद कर दिया गया था।

एक प्रभावशाली व्यक्तित्व जिसे कई उपाधियों से नवाजा गया

स्वदेशी उद्योग के अन्वेषक सेठ हुकमचन्द ने भारत में अनेक कॉटन मिल्स की स्थापना की जैसे हुकुम चंद मिल नामक एक विशाल जूट मिल और राजकुमार मिल नामक एक आयरन मिल। वे एक उत्तम मार्गदर्शक थे और अपनी व्यवहार कुशलता और अपने व्यापार कौशल के साथ, उन्होंने अपनी विरासत को कई गुना कर दिया और एक प्रभावशाली व्यक्ति बन गए।

हालाँकि सेठ हुकुमचंद मुंह में चांदी का चम्मच लेकर पैदा हुए थे फिर भी भारत के कॉटन प्रिंस ने अपने संपूर्ण जीवनकाल में अपने धन और प्रभाव को सामाजिक उद्धार के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने कई अस्पतालों की स्थापना की, जैसे सर हुकम चंद नेत्र अस्पताल और इंदौर के कांच मंदिर जैसे कई जैन मंदिरों के निर्माण और मरम्मत कार्य की सुविधा प्रदान की।

सेठ हुकुमचंद द्वारा की गई उल्लेखनीय परियोजनाओं के लिए उन्हें कई खिताबों से सम्मानित किया गया, जिनमें- सर, राय बहादुर, राज भूषण, राव राजा और राज्य रत्न शामिल हैं। वर्तमान में, उनकी भावी पीढ़ियां पैलेस इंदिरा भवन में निवास कर रही है, जो हुकुमचंद घण्टाघर के नाम से प्रसिद्ध है, हालांकि, इतवारिया बाजार में स्थित शीश महल उनका पैतृक घर है।

नॉक नॉक

लेकिन शायद इतिहास उनकी महान उपलब्धियों को पीढ़ियों तक पहुंचाने में इतना उदारत नहीं था हालाँकि मोटर वाहन के उत्साही लोग सेठ हुकुमचंद को जानते हैं क्यूंकि उनके पास महान गाड़ी गोल्ड डेमलर 1919 थी और अन्य राजकुमारों के विपरीत, इस राजकुमार ने अपने धन को कहीं ज़ाया नहीं किया बल्कि बाद में अपना अधिकांश कीमती से कीमती सामान धार्मिक गतिविधियों के लिए समर्पित कर दिया था और उनका जीवन इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे अनावश्यक व्यक्तिगत कुर्बानियों का गुण गान किये बिना पावर और प्रभाव से कोई व्यक्ति समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

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