मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले को अंतर्राष्ट्रीय नक़्शे पर उभारने वाला कूनो नेशनल पार्क प्राचीन काल से ऐतिहासिक रहा है। इस क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान के रूप में विकसित करने की कहानियां 1900 के दशक की शुरुआत से चली आ रही हैं, जब राजा माधवराव सिंधिया ने इस क्षेत्र में शेरों की आबादी को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया था। जबकि उनके सपने को साकार नहीं किया जा सका, उनके अचूक प्रयासों ने इस जगह को वनस्पतियों और जीवों के असंख्य निवास स्थान में बदलने की प्रेरणा दी। इंदौर से 7 घंटे की ड्राइव पर, आइए इस पार्क से जुड़े ऐसे और इतिहास को देखें, जिसे कुनो वाइल्डलाइफ सैंक्चरी के नाम से भी जाना जाता है।

काठियावाड़-गिर ड्राई पर्णपाती वन क्षेत्र का हिस्सा



जैव-विविधता से समृद्ध मध्य प्रदेश का यह क्षेत्र काठियावाड़-गिर शुष्क पर्णपाती वन पारिस्थितिकी क्षेत्र (Kathiawar-Gir dry deciduous forest eco-region) के अंतर्गत आता है। इसके महत्व को समझते हुए, राज्य सरकार ने सबसे पहले 1981 में यहां एक वाइल्डलाइफ सैंक्चरी की स्थापना की और बाद में इसे राष्ट्रीय उद्यान में परिवर्तित करके वन्यजीव संरक्षण के प्रयासों को मजबूत किया।

इस हरित क्षेत्र को जिसे कुनो राष्ट्रीय उद्यान के रूप में जाना जाता है, पास में पाए गए 30,000 साल पुराने गुफा चित्रों में भी देखा जा सकता है, जिन्हे देखकर ऐसा प्रतीत होता है की वे यहां पाए गए वन्यजीवों से प्रेरित हैं। माना जाता है की यह क्षेत्र पत्ती के आकार का है और कूनो नदी (जिसके नाम पर इस राष्ट्रीय उद्यान का नाम रखा गया है) इसके मध्य से बहती है।

कूनो का ऐतिहासिक महत्व



कूनो का इतिहास जटिल रूप से बुना गया है। कभी एशियाई शेर के पुनः परिचय के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में पहचाने जाने वाले, कुनो नेशनल पार्क ने इतिहास में अपना स्थान बना लिया है, क्योंकि सम्राटों और राजाओं ने यहां बेशकीमती जानवर पाए हैं। ग्वालियर के एक राज-पत्र में लिखा है कि मुगल सम्राट अकबर ने मालवा क्षेत्र से लौटते समय 1564 में शिवपुरी के पास के जंगलों में हाथियों के एक बड़े झुंड को पकड़ लिया था।

जाने से पहले जानिए!



इस जगह की राजसी आभा को आप सफारी के ज़रिये अनुभव कर सकते हैं और इसके परिदृश्य में आने वाले असंख्य किलों की यात्रा कर सकते हैं। यहाँ देखने के लिए कुछ ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं- पालपुर किला, आमेट किला और मैटोनी किला। इसके अलावा, कई झीलें और मंदिर हैं जो जो कुनो राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा करने वाले पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करते हैं।

यहां पाए जाने वाले कई पेड़ों में सबसे प्रचुर मात्रा में करधई के पेड़ है जिन्हे बड़े होने के लिए भारी मानसून की आवश्यकता नहीं होती है। नम हवा की उपस्थिति में भी यह हरा हो जाता है। यह व्यापक रूप से माना जाता है कि ये पेड़ कुनो की मूल भावना को दर्शाते हैं जो है- सबसे कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता। इसलिए, जब महामारी अनुमति दे, तो इस आकर्षक दृश्यों को देखें और देखें कि क्या यह कुछ कर सकने वाला रवैया आप पर भी हावी हो जाता है!

स्थान: मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले का कुनो वन्यजीव प्रभाग

इनपुट- सुगंधा पांडेय

अंग्रेजी में इस लेख को पढ़ने के लिए- https://www.knocksense.com/indore-city/kuno-national-park-madhya-pradesh