कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार

कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार

एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़

मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़।

इन पंक्तियों को पढ़कर यह समझ आता है की भाग्य और ईश्वर भी उन्ही का साथ देते हैं जिनके भीतर अपने अधिकारों के लिए लड़ने की क्षमता होती है, और मध्य प्रदेश के भोपाल की रहने वाली योगिता रघुवंशी इसका जीता जागता उदाहरण हैं। एक वकील,एक मां और भारत की पहली महिला ट्रक ड्राइवर योगिता का जीवन उन सभी लोगों के लिए मुँहतोड़ जवाब है जिन्हे लगता है महिलाएं बेहतर ड्राइव नहीं कर सकतीं। इसीलिए आज हम योग्यिता रघुवंशी की बहादुर कहानी आपसे सांझा कर रहे हैं की किस प्रकार एक पुरुषप्रधान पेशे में उन्होंने सामाजिक बेड़ियों को तोड़ा और अपने आस पास की सभी महिलाओं को प्रेरित किया।

सड़क का जीवन चुना


हालांकि, योगिता एक माँ और पत्नी के रूप में सुखी थीं, लेकिन उनके पति ने उन्हें कानून की पढ़ाई पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और फिर उनके पति की अकाल मृत्यु हो जाने से उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अपने घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए और अपने बच्चों के बेहतर पालन पोषण के लिए उन्होंने ऐसा मह्सूस किया केवल जूनियर वकील के तौर पर काम करना इन विषम परिस्थितियों में काफी नहीं होगा।


योगिता रघुवंशी ने सामाजिक ढर्रों और महिलाओं के लिए बनी हुई बेबुनियाद अपेक्षाओं के खिलाफ 2003 में एक ट्रक ड्राइवर के रूप में अपना सफर शुरू किया। अपने दृढ़ निश्चय और ईमानदारी के साथ आगे बढ़कर उन्होंने अपने बच्चों को सर्वोच्च शिक्षा प्रदान की। फिर पहचान उन्हें तब मिली जब उन्हें 2013 में महिंद्रा ट्रांसपोर्ट एक्सीलेंस अवार्ड (Mahindra Transport Excellence Award in 2013) से सम्मानित किया गया और बाद में शेल (Shell ) जैसी तेल की बड़ी कंपनी से सराहना मिली। उनके यह कठिन लेकिन गौरवशाली यात्रा आज फलीभूत हो गयी है और वे एक सफल व्यवसाय- राजहंस ट्रांसपोर्ट की मालकिन है।

Knock Knock

किस प्रकार से हम अपने जीवन के दुखों को संभालते हैं, यह हर व्यक्ति के लिए निजी और एक दुसरे से भिन्न यात्रा है। लेकिन जहां अपने जीवन के सबसे अज़ीज़ को खो देने के बाद उस दुःख के परे लोग देख भी नहीं पाते। वहीँ योगिता रघुवंशी जीवन में आगे बढ़ीं और वह किया जिससे उन कमज़ोर पलों में उन्हें बेहतर और शक्तिशाली महसूस हुआ, चाहे वो फिर कितना ही सामाजिक मान्यताओं से अलग क्यों न हो। हम योगिता के अदम्य साहस और ईमानदारी को नमन करते हैं और आशा करते हैं इसी प्रकार हर महिला अपने लिए वो रास्ता चुन सके जिस पर भले ही वह अकेली होगी लेकिन काफी होगी।