कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं होते 

                                                                             एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों 

कवि दुष्यंत कुमार की कलम से उद्घृत इन पंक्तियों को चरितार्थ किया है मध्य प्रदेश की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ लीला जोशी जी ने। उनके निरंतर निःस्वार्थ प्रयासों के कारण वे अकेले मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में मातृ मृत्यु दर (maternal mortality rate) को कम करने में सफल रही हैं। उनकी इसी अद्वितीय उपलब्धि के लिए भारत सरकार द्वारा उन्हें वर्ष 2020 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। डॉ.जोशी ने राजस्थान के कोटा में भारतीय रेलवे के साथ एक सहायक सर्जन के रूप में अपना करियर शुरू किया। वर्ष 1997 में रेलवे के मुख्य चिकित्सा डायरेक्टर के पद से सेवानिवृत्त डॉ. लीला जोशी ने रतलाम आकर इस आदिवासी क्षेत्र को अपनी कार्य भूमि बनाया। गांव-गांव जाकर एनीमिया के प्रति जागरूकता अभियान की शुरुआत की। 

वह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की एकमात्र महिला डॉक्टर हैं जो आदिवासी बहुल इलाकों में जाकर मुफ्त में उनकी सेवा करती हैं। डॉ. लीला जोशी की वर्ष 1997 में डॉ. लीला जोशी की मुलाकात मदर टेरेसा से हुई जिनसे वे अत्यंत प्रभावित हुईं। इस मिशन की प्रेरणा उन्हें मदर टेरेसा और उनकी मां से मिली जिन्होंने ग्रामीण इलाकों में कई महिलाओं को इलाज के अभाव में मरते देखा था। यही कारण है कि लीला जोशी डॉक्टर बनीं और बीमारों की सेवा में लगी रहीं और उनकी यह निःस्वार्थ सेवा आज भी जारी है। वे श्री सेवा संस्था (एसएसएस) एनजीओ शुरू करने के साथ-साथ वह इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पिंक इंडिया मिशन की स्टेट कोऑर्डिनेटर भी बनीं। 

23 साल का मिशन

अपने प्रोफेशनल करियर के दौरान डॉ. जोशी को अंदाज़ा हो चुका था कि भारत में हर साल मातृ मत्यू दर का आंकड़ा काफी अधिक है। इन आंकड़ों में सबसे ज्यादा आदिवासी महिलाओं शामिल हैं। खासकर ऐसी महिलाएं जो एनीमिक हैं। इस रिसर्च के बाद डॉ जोशी ने आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओँ के लिए कई कैंप लगाए और साथ ही उन्हें मुफ्त इलाज भी दिया। महिलाओं में खून की कमी को दूर करने के लिए डॉ जोशी आदिवासी इलाकों में कैंप लगाकर पिछले 23 साल से नि:शुल्क इलाज कर रही हैं। लीला जोशी आज 83 साल की उम्र में भी आदिवासी महिलाओं को जागरूक करने में लगी हुई हैं। यही वजह है कि लोग उन्हें मालवा की मदर टेरेसा कहने लगे हैं। 

100 सबसे प्रभावशाली महिलाओं में से एक 

वर्ष 2015 में देश के महिला एवं बाल विकास विभाग ने देश की 100 प्रभावशाली महिलाओं में डॉ. लीला जोशी का चयन किया। वह मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की एकमात्र महिला हैं जिन्हें देश की प्रभावशाली महिलाओं में चुना गया है। डॉ. लीला जोशी लगातार स्कूलों में कैंप लगाकर लड़कियों को खून की कमी के प्रति जागरूक कर रही हैं।

अपनी सेवा शुरू करने से पहले, डॉ जोशी ने सेवानिवृत्त स्वास्थ्य विशेषज्ञों और शिक्षकों की एक टीम तैयार की, जो समान रूप से सहानुभूतिपूर्ण, भावुक और समर्पित थे। उनकी टीम में स्थानीय लोगों के होने से भी रतलाम के दूर दराज़ के इलाकों में ग्रामीणों के साथ संबंध बनाने में आसानी हुई। वर्षों से, डॉ जोशी ने उन महिलाओं का इलाज किया है जिनका हीमोग्लोबिन स्तर बारह की आवश्यकता के मुकाबले चार था। ऐसा ही एक आंकड़ा स्कूली बच्चों में भी देखने को मिला। 

12/12/12 योजना के तहत 12 साल की लड़कियों या 12वीं कक्षा में पढ़ने वालों के लिए, एनजीओ सुनिश्चित करता है कि उनके रक्त में 12 ग्राम हीमोग्लोबिन हो। डॉ.जोशी नियमित रूप से स्कूलों और गांवों में इस मुद्दे की गंभीरता को सूचित करने और आमने-सामने बातचीत करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती हैं। 

डॉक्टर जोशी एक ऐसी शख्सियत हैं जिनका जीवन दूसरों को जीवन दान देने के लिए समर्पित एक अनुकरणीय जीवन है। हम कितना और क्या ऐसा लिख सकते हैं जो ऐसे ममतामयी व्यक्तित्व को शब्दों की डोर में बाँध सकें। हम शायद यही कह सकते हैं की यदि इंसानियत और समर्पण का कोई चेहरा होता तो हूबहू डॉक्टर लीला जोशी जैसा दिखता। 

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