इंदौर की एक विकलांग बच्ची सिमी दत्त ने होम आइसोलेशन में रहकर और समय पर अपनी दवा लेकर कोरोना के खिलाफ लड़ाई जीत ली है। एक अविकसित बाएं फेफड़े, एक गुर्दे और हाथ से उत्पन्न होने वाली शारीरिक समस्याओं के बावजूद, यह कक्षा 7 की छात्रा अपने दृढ़ साहस और आशावादी रवैये के साथ सभी बाधाओं को दूर करने में कामयाब रही है। सिमी दत्त की कहानी बहादुरी की मिसाल है, क्योंकि उनमें न केवल दृढ़ इच्छाशक्ति है बल्कि वे हमेशा आत्मनिर्भरता के साथ इस लड़ाई में सफल रही हैं।

शारीरिक सीमाओं से निडर और अडिग

सिमी दत्त के माता-पिता ने अपने विशेषज्ञ से संपर्क किया, जिनसे वे 2017 से संपर्क में हैं, जब सिम्मी को सांस लेने में तकलीफ होने लगी और हर समय थकान महसूस हो रही थी। दुर्भाग्य से, यह पता चला कि उसने कोरोनावायरस है और कथित तौर पर, दूसरी लहर के दौरान, उसके ऑक्सीजन का स्तर 40-50 तक गिर गया था।

डॉक्टर के मार्गदर्शन में, उसे लगातार BiPAP ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखा गया और दवाएँ दी गईं, जो उसने खुद लेना सीखा। आखिरकार सिमी दत्त ने वायरस को मात दे दी लेकिन रिपोर्ट् में कहा गया है कि इस बीमारी ने उनके शरीर को कमजोर बना दिया है। हालांकि, 12 साल की बच्ची को भरोसा है कि उसके बाद के कोरोना के लक्षण बेहतर हो जाएंगे।

सिमी दत्त जन्म से ही विकलांग हैं क्योंकि उनके शरीर का बायां हिस्सा कम विकसित था, हालांकि, एक भ्रूण के रूप में, उनके सोनोग्राम ने इन स्थितियों को प्रकट नहीं किया। उसके माता-पिता ने उसे हमेशा बेहतरीन अवसर प्रदान किए हैं और खेल, विशेष रूप से बास्केटबॉल, साइकिलिंग और स्केटिंग के लिए उसके जुनून को प्रोत्साहित किया है।

Knock Knock

सिमी दत्त का साहस और जीवन जीने का जुनून हमे यह सिखलाता है की एक बेहतर नज़रिये और अपने बलबूते पर जीने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति के सामने कोई दुविधा बड़ी नहीं है। उसके पिता ये कहते हैं, “हम उसके साथ सामान्य व्यवहार करते हैं और वह सब कुछ खुद करना चाहती है और किसी की सहायता लेना पसंद नहीं करती है।” हम मानते हैं कि यह कर गुजरने सकने वाला रवैया और परिवार का समर्थन ही जिससे आधी लड़ाई इंसान पहले ही जीत लेता है! 

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *