यूं तो गोवा खूबसूरत समुद्री तटों का राज्य है जहाँ देश दुनिया के पर्यटक रेत पर बैठकर घंटों सूरज की किरणों को समुद्र में खिलखिलाता हुआ देखते रहते हैं। लेकिन हम आज आपको गोवा के सदियों पुराने एक मंदिर और उससे जुड़ी एक प्राचीन कहानी सुनाने जा रहे हैं। उत्तरी गोवा के पोंडा तालुका में स्थित मां शांतादुर्गा का मंदिर गोवा के सबसे भव्य और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है।

यह मंदिर पूर्व की ओर मुख किये हुए स्थापित है और इसकी संरचना भारतीय तथा पुर्तगाली वास्तुकला का शानदार उदाहरण है। मंदिर के दोनों तरफ अगरशाला (अतिथिगृह) भवन स्थापित हैं और मंदिर के सामने एक बड़ा कुंड है। मंदिर के सामने एक बड़ा दीपस्तंभ है, जिसे उत्सवों में प्रज्ज्वलित किया जाता है। इस मंदिर की सुंदरता विशेष रूप से उत्सवों के दौरान देखने लायक होती है। मुख्य मंदिर के पास बायीं ओर भगवान नारायण का भी एक मंदिर है, जिसमें गणपति भगवान की भी मूर्ति है।

शांतादुर्गा माँ की शक्तिशाली कहानी


मंदिर से जुड़ी एक प्राचीन कथा अत्यधिक प्रचलित है। लोकप्रिय कथाओं के अनुसार, एक बार विष्णुजी और शिवजी के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध को देखकर ब्रह्माजी काफी चिंतित हुए और उन्होंने माता पार्वती से युद्ध शांत कराने का अनुरोध किया। मां ने शांतादुर्गा के रूप में भगवान विष्णु को अपने दाहिने और भगवान शिव को बायें हाथ में उठा लिया। माँ के दोनों देवताओं को हाँथ में उठाने के बाद यह युद्ध शांत हो गया और इसीलिए इन्हें शांतेरी या शांतादुर्गा कहा जाता है।

मां शांतादुर्गा भगवान शिव की पत्नी भी हैं और उनकी परम भक्त भी हैं। यही कारण है की इस मंदिर में शांतादुर्गा माँ भगवान् शिव की भी आराधना की जाती है और मंदिर में एक भव्य शिवलिंग भी स्थापित है।


मां शांतादुर्गा का यह मंदिर सदियों पुराना है और माँ की प्रतिमा पहले केलोशी में स्थापित थी फिर जब वहां पुर्तगालियों के अत्याचार बढ़ने लगे, तो मां शांतादुर्गा और श्री मंगेश की पूजा करने वाले परिवार एक अमावस की रात अपने आराध्यों की मूर्तियां लेकर वहां से निकलकर कवले तथा मंगेशी गांव पहुंचे। मां शांतादुर्गा की प्रतिमा कवले में और श्री मंगेश की प्रतिमा मंगेशी में स्थापित की गई। पुर्तगाली अभिलेखों के अनुसार इन मूर्तियों के स्थानांतरण की घटना 14 जनवरी, 1566 से 29 नवंबर, 1566 के बीच हुई थी। कुछ समय बाद ही मूल मंदिरों को पुर्तगालियों ने तोड़ दिया था।

उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, वर्तमान मंदिर का निर्माण 1713 ईस्वी से 1738 के बीच हुआ था। इसका निर्माण छत्रपति साहू जी महाराज के मंत्री नरोराम ने करवाया। मंदिर में समय-समय पर मरम्मत और नवीनीकरण का काम होता रहा। साहू जी महाराज ने 1739 में कवले गांव उपहार के रूप में मंदिर को दे दिया। मंदिर में कई उत्सव मनाए जाते हैं। यह सुबह 5 बजे से रात के 10 बजे तक खुला रहता है।


कैसे पहुंचें - मंदिर पणजी से करीब 33 किलोमीटर की दूरी पर है। नजदीकी एयरपोर्ट डाबोलिम में है, जो 45 किलोमीटर दूर है। नजदीकी रेलवे स्टेशन वास्कोडिगामा और मरगांव हैं। पणजी बस स्टैंड मंदिर से करीब 30 किलोमीटर दूर है। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन व बस स्टैंड से टैक्सी या स्थानीय साधनों से आसानी से मंदिर पहुंच सकते हैं।